Saturday, August 19, 2017

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ये है भुलक्कड़ों का रेस्त्रां, यहां भड़कना मना है, जानें इस रेस्त्रां के बारे में

अंग्वाल न्यूज डेस्क
ये है भुलक्कड़ों का रेस्त्रां, यहां भड़कना मना है, जानें इस रेस्त्रां के बारे में

तेज रफ्तार जिन्दगी या फिर अपना जायका बदलने के लिए लोग होटल या रेस्त्रां में खाना खाने जाते हैं। जरा सोचिए कि आप किसी होटल या रेस्त्रां में खाने जाएं और आपने जो भी आॅर्डर किया उसके बदले वेटर कुछ और ले आए तो कोई भी ग्राहक भड़क जाएगा। आपको बता दें कि जासपान में एक ऐसा होटल है जहां भड़कना मना है। ये है भुलक्कडों का रेस्त्रां। इस अजीबो-गरीब रेस्त्रां का नाम है ‘रेस्टोरेंट ऑफ आर्डर मिस्टेक्स’।

लोगों के बीच चर्चा का विषय 

रेस्टोरेंट ऑफ आर्डर मिस्टेक्स टोक्यो का बेहद चर्चित रेस्त्रां बन चुका है। इस रेस्त्रां की खासयित यह है कि यहां पर डिमेंशिया यानी भूलने की बीमारी से पीड़ित लोगों को वेटर की नौकरी दी जाती है।  2 से 4 जून तक यह रेस्त्रां ट्रायल बेसिस पर चलाया गया था लेकिन अब यहां ग्राहकों ने आना शुरू कर दिया है। मजेदार बात यह है कि यह रेस्त्रां लोगों को खूब पसंद आ रहा है।

ग्राहकों का अनुभव

यहां पर आए मिजुहा कोदों नाम के एक ग्राहक ने हंसते हुए बताया कि ‘हमें जब यह पता चला कि टोक्यो में एक ऐसा रेस्त्रा हैं जहां पर हम अपने आर्डर के हिसाब से खाना बिल्कुल भी नहीं खा सकते। जो वेटर लाएगा वही आपको खाना पड़ेगा। तो हमने इसे आजमाना चाहा। यह अनुभव वाकई बहुत मजेदार था।’ दरअसल इस रेस्त्रां का पहला मकसद डिमेंशिया यानी भूलने की बीमारी का सामना करने वाले लोगों को वेटर बनाकर ये एहसास दिलाना है कि वे भी इसी समाज का हिस्सा हैं। बड़ी बात यह थी कि ग्राहकों को यह समझाना कि इन भोले भुलक्कड़ों से कैसे निपटना है। 

काॅन्सेप्ट बिल्कुल हटकर


इस रेस्त्रां का मकसद लोगों को डिमेंशिया जैसी बीमारी के प्रति जागरूक करना है। अब देखना यह होगा कि यह भुलक्कड़ वेटरों वाला यह रेस्त्रां कितना सफल होता है। फिलहाल तो यह लोगों का दिल जीत रहा है। इस रेस्टोरेंट का कंसेप्ट दूसरे होटलों से बिल्कुल हटकर है। यहां के वेटर ही स्पेशल नहीं है बल्कि पूरा स्टाफ दूसरों से हटकर है।

बीमारों की मदद करना

दरअसल यहां डाउन सिंड्रोम का सामना कर रहे लोगों को स्टाफ में रखा जाता है। डाउन सिंड्रोम यानी एक ऐसी मानसिक बीमारी जिसमें बुद्धि का विकास उम्र के मुकाबले काफी धीरे-धीरे होता है। हालांकि इनकी मदद के लिये यहां दूसरे लोग भी मौजूद रहते हैं। कैफे के फाउंडर ने बताया कि ऐसे लोग अपने आपको नाकाबिल समझने लगते हैं। अलग थलग रहने लगते हैं। लेकिन सच तो यह है कि यह हमारा हिस्सा हैं, यह महसूस कराना हमारा काम है।

 

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