Wednesday, November 14, 2018

ईश्वर की उपासना का सर्वोच्च माध्यम है ' ध्यान' लगाना , जानें ध्यान कैसे करें और क्या बरतें सावधानियां

अंग्वाल न्यूज डेस्क
ईश्वर की उपासना का सर्वोच्च माध्यम है

नई दिल्ली । ईश्वर की उपासना के लिए यूं तो कई तरीके हैं, लेकिन इन सब में से ध्यान सर्वोच्च स्थान पर हैं। कहा जाता है कि पूजा अर्चना से ज्यादा प्रभावशाली होता है ईश्वर की ध्यान करते हुए उनकी अराधना करना । असल में मन को किसी एक वस्तु पर एकाग्र करना या या यूं कहें कि मन को किसी एक ही बिंदू में लीन कर देना ही ध्यान है । इसके लिए सिर्फ आपकों सिर्फ अपनी आंखें ही बंद नहीं करनी होती, बल्कि आपको चक्रों पर ऊर्जा को संतुलित भी करना होता है जो इसका एक अहम हिस्सा है। यूं तो ध्यान लगाना कोई आसान काम नहीं है लेकिन जो इस मुद्रा में चला जाता है उसे अनंत आनंद का अनुभव होता है। इसे समाधि भी कहा जाता है। इस स्थिति में पहुंचने के लिए कई साधु-संतो और गुरू-आचार्यों ने ध्यान लगाने की कई विधियों पर व्याख्यान तक दिए हैं। तो चलिए हम बताते हैं कि देश के विख्यात गुरुओं -आचार्यों ने ध्यान लगाने के क्या उपाय बताए हैं...

बुद्ध ने बताया ईश्वर को पाने का मार्ग

ध्यान लगाने के लिए बुद्ध ने भी लोगों को मार्ग दिखाया था। उनके अनुसार , अष्टांग योग ध्यान लगाने का सबसे बेहतर मार्ग होता है। इतना ही नहीं उन्होंने आचरण , व्यवहार और जीवन दर्शन के माध्यम से ईश्वर की उपलब्धि के लिए कार्य किए। असल में बुद्ध की ध्यान पद्धति में चक्र , चक्के की तरह होते हैं। लेकिन आज के समय में उनकी ध्यान पद्धति आज के दौर में बहुत सी पद्धतियों में समाहित हो गई है। बावजूद इसके देश-दुनिया में मौजूद लामाओं ने उनकी ध्यान परंपरा के मूल रूप को जिंदा रखा है। 

योगानंद

इसी क्रम में परमहंस योगानंद जी ने भी ध्यान के लिए क्रिया योग की विधि को दुनिया के सामने रखा। हालांकि इस क्रिया योग पद्धति के जनक बाबा जी महाराज को बताया जाता है, जिसमें कई चरणों के बाद ही ध्यान तक पंहुचने का अवसर मिलता है । असल में क्रिया योग पद्धति , तमाम ध्यान पद्धतियों का अनूठा संयोग है।

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आनंदमूर्ति

अगर बात आनंदमूर्ति जी के बारे मे करें तो उन्होंने भी ईश्वर की प्राप्ति के लिए बहुत सी ध्यान पद्धति का न केवल सृजन किया बल्कि उनका विकास भी किया। खास बात ये रही कि शिव, कृष्ण और बुद्ध की ध्यान पद्धतियों को दोबारा जीवित करने और उनका समन्वय करने का श्रेय आनंदमूर्ति जी को जाता है। इन्होने सहज योग, विशेष योग और मधुर साधना जैसी तमाम ध्यान पद्धतियां दी हैं। यहाँ पर भी चक्र कमल के पुष्प की तरह ही हैं। यम - नियम के साथ इनकी साधना और ध्यान की पद्धतियां व्यक्ति को भौतिक और आध्यात्मिक उपलब्धि , दोनों दे सकती हैं।

ओशो (रजनीश)

ध्यान केंद्रों की बात करें तो ओशो रजनीश का नाम भी आता है। उन्होंने ध्यान के लिए समाज के हर वर्ग के सामने सोचने का एक नया नजरिया पेश किया। उनकी ध्यान की विधि दुनिया में सबसे ज्यादा सरल और प्रचलित बताई गई है। उन्होंने अपनी सक्रिय ध्यान पद्धति को पांच चरणों में बांटा।  इस ध्यान को समूह में या अकेले करना होता है, परन्तु यह समूह में ज्यादा प्रभावशाली होता है। ओशो के ध्यान में रंग, सुगंध और नृत्य-संगीत पर भी विशेष जोर दिया गया है । इनके ध्यान और साधना में चक्रों को कमल पुष्प के सामान बताया गया है।

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