Friday, October 20, 2017

देवभूमि में भगवान भोलेनाथ का एक ऐसा मंदिर जहां पूजा करने को अपने लिए खतरा मानते हैं भक्त

अंग्वाल न्यूज डेस्क
देवभूमि में भगवान भोलेनाथ का एक ऐसा मंदिर जहां पूजा करने को अपने लिए खतरा मानते हैं भक्त

उत्तराखंड यानि  देवभूमि...जहां की भूमि पूजनीय है...कई शक्तिपीठों और धामों की इस भूमि पर कई मंदिर ऐसे भी हैं जिनके अस्तित्व की कहानियां भी बेहद रोचक हैं। चलिए आपको बताते हैं उत्तराखंड के ऐसे ही एक मंदिर से जो एक व्यक्ति ने, एक दिन में, एक ही औजार से बनाया है। सुनकर चौंक गए ना, लेकिन ये कोई मजाक नहीं...सच्चाई है। तो चलिए जानते हैं एक हथिया मंदिर के बारे में।  

पिथौरागढ़ से 70 किलोमीटर दूर है 

उत्तराखंड के कुछ रहस्मयी मंदिरों में से एक है 'एक हथिया मंदिर'। उत्तराखंड के सीमान्त जनपद पिथौरागढ़ से 70 किलोमीटर दूर स्थित है कस्बा थल । वहाँ से लगभग 6 किलोमीटर दूर स्थित है ग्राम सभा बल्तिर । यहां पर एक श्रार्पित मंदिर है जिसका नाम है 'एक हथिया देवाल'। यह शिव भगवान को समर्पित मंदिर है लेकिन इस मंदिर में पूजा-पाठ करना मना है।

कैसे पड़ा इसका नाम एक हथिया मंदिर'

दंत कथाओं के अनुसार 12वीं शताब्दी में बने इस मंदिर के बारे में प्रचलित है कि इस मंदिर का निर्माण एक आदमी ने मात्र एक ही रात में,एक ही हाथ से और मात्र एक ही पत्थर को काटकर किया था । शायद इसी कारण इस मंदिर को 'एक हथिया देवाल' के नाम से जाना जाता है। पुराने ग्रंथों, अभिलेखों में भी इस मंदिर के बारे में जानकारी मिलती है। किसी समय यहां राजा कत्यूरी का राज्य था। उस दौर के शासकों को स्थापत्य कला से बहुत प्रेम था। यहां तक कि वे इसकी दूसरों से प्रतियोगिताएँ भी करते थे। 

नागर और लैटिन शैली में बना है मंदिर

इस मंदिर की खास बात यह है कि यह नागर और लैटिन शैली में बना हआ है। पूरे मंदिर को एक पत्थर तराश कर बनाया गया है। इस मंदिर के अंदर जो शिवलिंग है वो भी ऐसे ही बने हैं । इस मंदिर की ऊंचाई 1.85 मीटर और चौड़ाई 3.15 मीटर है। मंदिर का प्रवेश द्वार पश्चिम दिशा की तरफ है। जिस तरह इसका एक दिन में होने वाला निर्माण आश्चार्यजनक है उसी तरह इस मंदिर की एक और बात अद्भुत है और वो है कि मंदिर में पूजा-अर्चना का निषेध होना। जी हाँ, मंदिर को देखने तो लोग दूर- दूर से पहुंचते हैं, परंतु पूजा-अर्चना निषेध होने के कारण केवल देख कर ही लौट जाते हैं।


 

जानिए आखिर क्यों नही होती पूजा

इस मंदिर से जुड़ी कई कहानियाँ प्रचलित हैं । एक दंतकथा के अनुसार इस गाँव में एक मूर्तिकार रहता था जो पत्थरों को काटकर मूर्तियाँ बनाता था। एक बार किसी दुर्धटना में उसका एक हाथ कट गया। वह बहुत निराश हुआ पर हारा नही मानी ।अब उसने एक हाथ के सहारे मूर्तियाँ बनाने की ठानी किन्तु गाँव के कुछ लोगों ने उसका बहुत मजा़क बनाया और उसे परेशान किया। पूरे गाँव से अपने लिए ऐसी बातें व अपनी उपेक्षा सुन मूर्तिकार काफी निराश हुआ। ऐसे में उसने गाँव छोड़ने का निश्चय किया और एक रात वो अपनी छेनी, हथौड़ा लेकर गाँव के दक्षिणी की ओर निकल पडा। जब सुबह गाँव वाले दक्षिण दिशा की ओर गए, जिस इलाके को वो शौच आदि के लिए इस्तेमाल करते थे, तो वँहा एक मंदिर देख सभी हैरान रह गए। उस दिशा में रात भर उस कारीगर ने चट्टान को काटकर एक देवालय का रूप दे दिया था।

जानिए कि आखिर क्यों नहीं होती इस मंदिर में पूजा

रातों-रात मंदिर स्थापित होने की खबर आग की तरह चारों ओर फैल गई।  स्थानीय पंडितो ने उस मंदिर के अंदर उकेरी गयी भगवान शंकर के लिंग और मूर्ति को देखा तो कुछ खामिया पाई गईं। असल में मंदिर बनाने वाले ने जल्दबाजी में मंदिर के अंदर स्थापित शिवलिंग का अरघा विपरीत दिशा में बना दिया, जिसकी पूजा फलदायक नहीं होगी। ऐसी स्थिति को दोषपूर्ण माना जाता है। इसके बाद मंदिर में पूजा नहीं की गई।एक अन्य कथा के अनुसार, यहां के राजा ने एक कारीगर के हाथ कटवा दिए ताकि वो कोई दूसरी सुंदर कारीगरी न कर सके। इससे आहत होकर उस कारीगर ने अपने एक ही हाथ से इस मंदिर का निर्माण किया और इलाके को छोड़कर चला गया। जब जनता को राजा की इस करतूत का पता चला तो वे बहुत दुखी हुए लेकिन राजा के डर के मारे लोगों ने इस मंदिर में कभी पूजा नहीं की। तब से इस मंदिर में पूजा नहीं हो रही है।

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