Saturday, October 20, 2018

मां दुर्गा की अराधना का पर्व कल से, जानें पूजा का विधि-विधान, जानें कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त

पंडित विवेक खंकरियाल
मां दुर्गा की अराधना का पर्व कल से, जानें पूजा का विधि-विधान, जानें कलश स्थापना का शुभ मुहूर्त

सर्व मंगल मांगल्ये सिवे सर्वाथ साधिके ।शरण्ये त्रयंबके गौरी नारायणी नम्स्तुते । ।

पितृपक्ष खत्म होने के साथ ही बुधवार से माता के नवरात्रे शुरू हो रहे हैं। इस बार घट स्थापना का शुभ मुहूर्त का समय ब्रह्रम मुहूर्त के साथ ही सुबह 6.10 बजे से लेकर 10.11 मिनट तक का है। बता दें कि इस बार आश्विन (शारदीय) महानवरात्र 10 से 19 अक्तूबर तक रहेगा।18 अक्टूबर को अंतिम नवरात्रि होगी। इस दौरान माता के भक्त नौ दिन तक माता के विभिन्न रूपों की पूजा-अराधना करते हुए अपने घर-परिवार-कुटुंब के लिए खुशहाली की कामना करते हैं। पर क्या आप जानते हैं मां के नौ स्वरूप की क्या है पौराणिक कथाएं। क्या आप जानते हैं किस तरह माता की पूजा-अर्चना के लिए तैयारी करनी चाहिए। अगर नहीं तो आइये हम आपको बताते हैं-

नवरात्र के पहले दिन मां के जिस स्वरूप का पूजन किया जाता है उसे हमें शैलपुत्री के रूप से जानते हैं। बता दें कि पर्वत राज हिमालय के घर पुत्री के रूप में जन्म लेने के कारण मां दुर्गा के इस रूप का नाम शैलपुत्री पड़ा। शास्त्रों के कथनानुसार मां शैलपुत्री का दिव्य स्वरूप है। मां के दाहिने हाथ में भगवान शिव के द्वारा दिया गया त्रिशूल और भगवान विष्णु द्वारा प्रदत कमल का फूल अति शोभायमान है। मां शैलपुत्री बैल पर सवारी करती हैं और समस्त जीवों की रक्षा करती हैं। पौराणिक कथानुसार मां शैलपुत्री अपने पूर्व जन्म में प्रजापति की पुत्री सती थीं, जिनका पाणिग्रहण संस्कार भगवान शिव के साथ हुआ था।

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 --पूजन का विधान--

1- मां का पूजन करने से पहले अपने देवस्थान को साफ कर लें। इसके बाद गंगाजल का छिड़काव कर स्थान को पवित्र करें और अपने हिसाब से सजा लें।

2- इसके बाद सर्वप्रथम गणेश पंचांग चौकी तैयार करें, जिसमें गौरी-गणेश, ओमकार (ब्रहमा-विष्णु-महेश) स्वास्तिक, सप्त घृतमात्रिका, योगनी, षोडस मात्रिका, वास्तु पुरुष, नवग्रह देवताओं समेत वरुण देवता को तैयार करें।

3- तदोपरांत सर्वतो भद्र मंडल (चावल से बनाया गया आसन, जिसपर आह्वान करके हमारे सभी देवी-देवताओं को विराजमान किया जाता है। ) को तैयार करें।


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4- इसके बाद एक सकोरे में मिट्टी भरकर उसमें जौ को बोएं और देव स्थान पर रख दें।

5- इसके बाद माता के मंदिर को चुनरी और फूल मालाओं से सजाएं। माता की मूर्ति पर रोली का टिका लगाएं। चावल लगाएं। साथ ही देवस्थान पर अपनी श्रद्धानुसार फल-फूल-मिष्ठान तांबुल दक्षिणा इत्यादि समर्पित करें।

6- इसके बाद अपने अनुसार या ब्राह्मणों के द्वारा पाठ करें/कराएं।

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असल में शरद ऋतु में आने वाले आश्विन मास के नवरात्र को शारदीय नवरात्र भी कहा जाता है। एक साल में चार नवरात्र होते हैं, जिनमें से दो गुप्त नवरात्र होते हैं, लेकिन चैत्र और आश्विन माह के नवरात्र ही ज्यादा लोकप्रिय हैं। आश्विन नवरात्र को महानवरात्र कहा जाता है। इसका एक कारण यह भी है कि ये नवरात्र दशहरे से ठीक पहले पड़ते हैं। दशहरे के दिन ही नवरात्र को खोला जाता है। नवरात्र के नौ दिनों में मां के अलग-अलग रुपों की पूजा को शक्ति की पूजा के रुप में भी देखा जाता है।

नवरात्र पर देवी पूजन और नौ दिन के व्रत का बहुत महत्व है। मां दुर्गा के नौ रूपों की आराधना का पावन पर्व शुरू होने वाला है. आइए जानते हैं इस बार नवरात्र कब से शुरू हो रहे हैं। 

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