Monday, November 20, 2017

आखिर शिवलिंग पर क्यों चढ़ाया जाता है दूध, जानिए शिवपुराण के अनुसार क्या है इसके पीछे मान्यता

अंग्वाल संवाददाता
आखिर शिवलिंग पर क्यों चढ़ाया जाता है दूध, जानिए शिवपुराण के अनुसार क्या है इसके पीछे मान्यता

शिव, महादेव, भोले शंकर, नीलकंठ और न जानें कितने ही नामों से भगवान शिव को संपूर्ण संसार में जाना जाता है। भगवान शिव के बारे में कहा जाता है कि वह सृष्टि के संचालक है, विनाश के देवता है और जब-जब पृथ्वी पर पाप बढ़ता है तब-तब वह अपनी प्रलय लीला द्वारा संसार का सृजन करते हैं। वहीं भगवान शिव की पंसद भी सभी भगवानों से अलग है। भगवान शिव का एक अन्य रूप शिवलिंग भी कई मायनों में अलग है। शिवलिंग की पूजा करने में कुछ ऐसे रिति-रिवाजों का पालन किया जाता है जो भगवान शिव को बहुत पंसद आते हैं, जिन में से एक है शिवलिंग पर दूध का चढ़ाया जाना। 

 

 

ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव को दूध से अभिषेक किया जाना बेहद प्रिय है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि शिवलिंग पर दूध क्यों अर्पित किया जाता है। दरअसल, इसके पीछे भी एक पौराणिक कथा है। जो समुद्र मंथन की कथा से संबंधित है। समुद्र मंथन की पूरी कथा विष्णुपुराण और भागवतपुराण में विस्तार से उल्लेखनीय है। जिसमें से एक कथा मिलती है। इस कथा के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान जब विष की उत्पति हुई थी तो पूरा संसार इसके तीव्र प्रभाव में आ गया था।

 

 


इसके कारण सभी लोग भगवान शिव की शरण में आ गए क्योंकि महादेव के अलावा विष की तीव्रता को सहने की क्षमता किसी और देवी- देवता में नहीं थी। महादेव ने बिना किसी भय संसार के कल्याण हेतु विष का सेवन कर लिया। विष की तीव्रता इतनी अधिक थी कि भगवान शिव का कंठ नीला हो गया। विष के घातक प्रभाव शिव और शिव की जटा में विराजमान देवी गंगा पर पड़ने लगा। ऐसे में शिव को शांत करने के लिए जल की शीतलता पार्यप्त नहीं थी। सभी देवताओं ने उनसे दूध का ग्रहण करने के लिए निवेदन किया, अपनी जीव मात्र की चिंता के कारण भगवान शिव ने दूध से उनके द्वारा ग्रहण करने की आज्ञा मांगी।

 

स्वभाव से शीतल और निर्मल दूध ने शिव के इस विनम्र निवेदन को स्वीकार किया। महादेव ने दूध को ग्रहण किया, जिससे उनके शरीर के विष की तीव्रता काफी कम हो गई पंरतु उनका कंठ हमेशा के लिए नीला हो गया और उन्हें भगवान नीलकंठ के नाम से जाने जाना लगा।

 

कठिन समय में दूध ने शिव और संसार के कल्याण के लिए भगवान शिव के पेट में जाकर विष की तीव्रता को सहन किया। इसलिए शिव को दूध अत्यधिक प्रिय है। साथ ही कहा गया है सांप को गले में धारण करने वाले शिव को इस समय सांपों ने भी विष के प्रभाव को कम करने के लिए विष की तीव्रता को खुद मेें समाहित कर लिया था।

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