Thursday, December 14, 2017

जानिए सावन के माह में महादेव को खुश करने के खास उपाय, ऐसे करें पूजा-अर्चना

अंग्वाल संवाददाता
जानिए सावन के माह में महादेव को खुश करने के खास उपाय, ऐसे करें पूजा-अर्चना

सावन के इस पावन माह में सभी भक्त भगवान शिव को खुश करने के लिए कई प्रकार के आध्यात्मिक उपायों को अपनाने हैं। ऐसा कहा जाता है कि भगवान भोले सबसे जल्दी अपने भक्तों की भक्ति से प्रसन्न होकर, उनकी मनोकमानाएं पूरी करते हैं। मान्यता के अनुसार सावन का माह खासरूप से भागवन शिव को प्रिय होता है। अगर ऐसे में कोई भगवान शिव की अराधना करता है तो उसे संभवत अपनी मनोकामना की इच्छापूर्ति का फल बहुत जल्द ही मिलता है। हालांकि ऐसे में प्रश्न उठता है कि भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए उनकी पूजा-अर्चना किस रुप से की जाए। तो आइए आज हम आपको बताएंगे शिव महापुराण के महत्व व उसमें दिए गए महादेव को खुश करने के उपाय के बारे मे...

 

 

शास्त्रों में 18 महापुराणों के बारे में बताया गया है। इन सभी महापुराणों में शिव महापुराण को सबसे ज्यादा अहमियत दी गई है। शिवपुराण के मुताबिक कहा जाता है कि इस महापुराण का पाठ करने से सभी पापों का नाश होता है। वहीं पुराण में कई ऐसे भी उपायों के बारे में बताया गया जिनको करने से भगवान शिव के भक्त को कभी भी आर्थिक तंगी का सामना नहीं करना पड़ता है। कहा जाता है कि अगर शिव महापुराण के इन उपायों को पूरी आस्था और विश्वास के साथ किया जाए तो भगवान भोलेनाथ बहुत ही प्रसन्न हो जाते हैं।

 


 

शिव महापुराण में बताया गया है कि जो व्यक्ति अपने हाथों से बेलपत्र को तोड़कर शिवलिंग पर चढ़ाता है। उसे पूर्वजन्मों के पापों से मुक्ति मिल जाती है। भगवान शिवजी अपने भक्तों के सभी पापों को माफ कर देते हैं। शिव महापुराण में बेल के पेड़ के बारे में बताया जाता है कि जो लोग कुमकुम चंदन, दीप और फूल से पूजा करते हैं, उन पर महादेव अपनी कृपा बनाए रखते हैं। लगातार भगवान शिव की ऐसे पूजा-अर्चना करने से शिवलोक में भक्त को जगह मिलती है। ऐसे लोगों को कभी जीवन में कोई दुख नहीं आता है।

शिवपुराण के अनुसार जो लोग बेल के पेड़ के नीचे भोजन करवाते हैं उन्हें ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। साथ ही ऐसा भी कहा जाता है कि बेल वृक्ष के नीचे रोज नियमित रूप से दीपक जलाने से जातक को ज्ञान की प्रप्ति होती है। इतना ही नहीं जातक अगर बेल के वृक्ष के नीचे स्नान करते हैं तो उसे संपूर्ण तीर्थों के स्नान के बराबर का फल प्राप्त होता है। माना जाता है कि सभी तीर्थ स्थलों में बास बेल के मूल भाग में होता है।

 

 

 

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