Sunday, June 24, 2018

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सपा-बसपा ने यूपी में 'महागठबंधन' से किया कांग्रेस को बाहर! , सियासी गरमाहट देखते हुए बन रही ये खास रणनीति

अंग्वाल संवाददाता
सपा-बसपा ने यूपी में

लखनऊ । आगामी लोकसभा चुनावों में केंद्र की मोदी सरकार से लड़ने के लिए विपक्ष के महागठबंधन में दरारें नजर आ रही हैं। खासकर यूपी में लोकसभा चुनावों के मद्देनजर सपा-बसपा का गठबंधन इस महागठबंधन के आड़े आने वाला है। ऐसी खबरें हैं कि पिछले कुछ उपचुनावों में सपा-बसपा के गठबंधन ने जो बेहतर प्रदर्शन किया है उसे जारी रखते हुए आगामी लोकसभा चुनावों में भी इन दोनों दलों ने सीटों के बंटवारे का एक फॉर्मूला बना लिया है, जिसमें उसने कांग्रेस को बाहर का रास्ता दिखा दिया है। ऐसा माना जा रहा है कि चुनावों के मद्देनजर 80 सीटों में से 40 सीटों पर बसपा अपने उम्मीदवार उतारेगी, जबकि 35 सीटों पर सपा अपने उम्मीदवारों को उतारेगी। शेष बची 5 सीटें अन्य दलों के लिए छोड़ी जाएंगी। ऐसी खबरें हैं कि कांग्रेस की राहुल और सोनिया गांधी की सीटों पर सपा-बसपा अपने उम्मीदवार नहीं उतारेगी, जबकि 3 सीटों पश्चिम उत्तर प्रदेश में लोकदल को दी जा सकती हैं। अब ऐसे में सपा-बसपा कां कांग्रेस को मात्र 2 सीटें देने का फॉर्मूले धरातल पर आया तो कांग्रेस का इस महागठबंधन से बाहर आना तय है।

यूपी में कांग्रेस ने खोया अपना आधार

असल में पिछले कई चुनावों में कांग्रेस अपने नाम के अनुसार बड़ा प्रदर्शन करने में असफल साबित हुई है। लगातार कई राज्यों से उनकी सत्ता भाजपा ने छीन ली है। अगर बात यूपी की करें तो यहां भाजपा अपना आधार खो चुकी है। पिछले दिनों फूलपुर और गोरखपुर में हुए उपचुनावों में कांग्रेस ने अपना उम्मीदवार उतारा था, जिन्हें महज 19,353 और 18,858 वोट ही मिले। ऐसे में साफ हो गया कि अब यूपी में कांग्रेस को अपना खोया आधार पाने के लिए लोगों के जुड़ने की जरूरत है।

न दलित साथ न अल्पसंख्यक

असल में सपा और बसपा के ही कई नेताओं का कहना है कि कांग्रेस का देश में जनाधार घट रहा है। हाल ये है कि अब न तो कांग्रेस के साथ दलित वर्ग के लोग हैं न ही अल्पसंख्यकों का भरोसा अब कांग्रेस पर रह गया है। ओबीसी को भी साधने की कोशिश में पार्टी लगी हुई है, लेकिन ऐसा लग नहीं रहा कि वह कांग्रेस की बातों और दावों से सहमत हैं। 

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सपा-बसपा के साथ कांग्रेस आई तो ...

राजनीति के जानकारों का कहना है कि इस बात में कोई दो राय नहीं इस समय कांग्रेस ने अपना जनाधार खोया है। इस समय न तो अल्पसंख्य ही कांग्रेस के साथ खड़े हैं न ही दलित। कांग्रेस को सवर्णों का साथ मिल रहा है, लेकिन कांग्रेस सपा-बसपा के साथ खड़ी होती है तो ये बात तय है कि ये सवर्ण भी भाजपा के साथ चले जाएंगे। 


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कांग्रेस को खुद से अलग रखने में लाभ

सपा-बसपा के नेताओं का भी माना है कि अगर कांग्रेस को हम अपने गठबंधन से दूर रखते हैं तो सवर्णों के वोट कांग्रेस और भाजपा के बीच बंट जाएंगे। लेकिन कांग्रेस के साथ आने पर वो वोट भाजपा के पक्ष में गिरने की आशंका है। ऐसे में सपा-बसपा के नेता भी चाहते हैं कि कांग्रेस उनके साथ न आकर अकेले लोकसभा चुनावों में उतरे।

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ये था 2014 में लोकसभा का गणित

बता दें कि 2014 के लोकसभा चुनावों में 80 सीटों में से भाजपा के गठबंधन ने 73 सीटों पर जीत दर्ज की थी, जबकि 5 सीटें सपा को और 2 सीटें कांग्रेस के हाथ लगी थी। पिछले लोकसभा चुनावों में बसपा के हिस्से एक भी सीट नहीं आई थी।   

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