Monday, September 24, 2018

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निलंबित शिक्षिका को लेकर किए अपने वादों से पलटे शिक्षा मंत्री, नो कमेंट कहकर निकले 

अंग्वाल न्यूज डेस्क
निलंबित शिक्षिका को लेकर किए अपने वादों से पलटे शिक्षा मंत्री, नो कमेंट कहकर निकले 

देहरादून। सीएम के जनता दरबार में अपशब्दों का इस्तेमाल करने पर निलंबित हुई शिक्षिका के मामले में शिक्षा मंत्री अपने वायदों से मुकर गए। इस मामले पर पत्रकारों के द्वारा पूछे गए सवालों पर उन्होंने ‘नो कमेंट’ कहकर कन्नी काट ली। उनके इस जवाब के पीछे ऐसा माना जा रहा है कि मुख्यमंत्री को मंत्री का यह व्यवहार नागवार गुजरा है। दोनों में हुई बातचीत के बाद ही शिक्षा मंत्री ने निलंबित शिक्षिका से मिलने से इंकार कर दिया। 

गौरतलब है कि सीएम के द्वारा निलंबित की गई शिक्षिका से शिक्षा मंत्री ने मिलने का वादा किया था लेकिन ऐसा कहा जा रहा है कि मुख्यमंत्री के दवाब की वजह से शिक्षा मंत्री ने निलंबित उत्तरा पंत से मिलने से मना कर दिया। यहां बता दें कि शिक्षिका के निलंबन के बाद प्रदेश में राजनीति काफी तेज हो गई है, राजनीतिक  पार्टियों के अलावा शिक्षक संघ ने भी उसे समर्थन देने और राज्य में आंदोलन छेड़ने की बात कही थी। आमतौर पर पत्रकारों से खुलकर बातें करने वाले शिक्षा मंत्री  इस मामले पर पूछे गए सवाल पर वे ‘नो कमेंट’ कहते हुए आगे निकल गए। 

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यहां बता दें कि सीएम के जनता दरबार में अपने तबादले को लेकर पहुंची शिक्षिका ने त्रिवेन्द्र सिंह रावत को काफी भला-बुरा कहा था, इसके बाद सीएम ने उसे निलंबित कर दिया था। इस घटना के बाद शिक्षा मंत्री पांडे ने शिक्षिका से खुद ही मुलाकात करने का वायदा कर डाला था। उन्होंने बाकायदा फोन कर शिक्षिका को ढाढ़स भी बंधाया था लेकिन सीएम कार्यालय की ओर से शिक्षा मंत्री को यह संकेत दिए गए कि उनका यह कदम ठीक नहीं है। 


अब इस मामले को लेकर सियासी हलकों में यह चर्चा भी काफी गर्म है कि शिक्षिका उत्तरा बहुगुणा के मामले में प्रदेश सरकार यह संदेश नहीं देना चाहती कि वह दबाव में है लेकिन वह जनता के बीच यह संदेश भी नहीं जाने देना चाहती कि वह अध्यापिका को लेकर पूर्वाग्रह से ग्रस्त है और उसको किसी तरह का नुकसान पहुंचाना चाहती है। खबरों के अनुसार उत्तरा बहुगुणा को देहरादून में पोस्टिंग नहीं दी जाएगी इस बात के संकेत उनसे मिले शिक्षा निदेशक आरके कुंवर पहले ही दे चुके हैं।

माना जा रहा है कि उत्तरा को सुगम में तैनाती देने से तबादला कानून का उल्लंघन होगा। इससे सरकार के पास इस तरह के मामलों की संख्या काफी बढ़ जाएगी। ऐसे में मामला अदालत के पेंच में फंस सकता है। 

 

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