Friday, April 19, 2019

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उत्तराखंड में बर्फ की चादरें 16 फीसदी तक बढ़ी , इस साल नहीं होगी पहाड़ों पर पानी की किल्लत

अंग्वाल न्यूज डेस्क
उत्तराखंड में बर्फ की चादरें 16 फीसदी तक बढ़ी , इस साल नहीं होगी पहाड़ों पर पानी की किल्लत

देहरादून । उत्तराखंड में इस साल हुई बर्फबारी ने पिछले कई सालों से रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। उत्तराखंड अंतरिक्ष उपयोग केंद्र (यूसैक) ने गत दिसंबर , जनवरी और फरवरी के दौरान सेटेलाइट इमेजों के अध्ययन के बाद खुलासा किया है कि इस बार देवभूमि में बर्फ का दायरा 16 फीसदी बढ़ गया है। अध्ययन में सामने आया है कि इस बार उच्च हिमालयी क्षेत्र में बर्फ का आवरण 70 फीसदी के बजाए 86 फीसदी हो गया है । यूसैक ने इसके लिए हिमालयी क्षेत्र की पांच घाटियों का अध्ययन किया है, जिसमें भागीरथी घाटी, अलकनंदा घाटी, धौली, गौरी गंगा घाटी में अध्ययन किया। शोध में सामने आया है कि इस साल यहां बर्फ का दायरा 4 से 10% तक बढ़ा है। वहीं कहा जा रहा है कि इन घाटियों में हुई बर्फबारी के चलते आने वाले सयम में गंगा, यमुना, शारदा पर निर्भर उत्तर भारत को सिंचाई के लिए ज्यादा पानी मिल सकेगा। इतना ही नहीं ग्लेशियरों से निकलने वाली नदियों पर बांधों को ज्यादा पानी मिलने की स्थिति सामने आएगी, जिससे बिजली उत्पादन बढ़ेगा ।

इस अध्ययन पर यूसैक निदेशक प्रो. एमपीएस बिष्ट का कहना है कि इस बार उत्तराखंड में रिकॉर्ड बर्फबारी हुई है। हमारे शोध में सामने आया है कि इस बार उच्च हिमालय की हर घाटी में बर्फ में वृद्धि हुई है। जिन पांच घाटियों का इस दौरान अध्ययन किया गया है उसमें सबसे ज्यादा बढ़ोतरी गौरी गंगा घाटी में दर्ज हुई है। इस क्षेत्र में हिम क्षेत्र में करीब 12 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई है। उनका कहना है कि पिछले 20 सालों की बात करें तो हिमालय और मध्य हिमालय के बीच कई ऐसे क्षेत्र थे, जो एस समय हिम क्षेत्र में गिने जाते थे लेकिन पिछले कुछ सालों में  ग्लोबल वार्मिंग के चलते यहां से बर्फ लगभग खत्म ही हो गई थी लेकिन इस बार यहां काफी चौंकाने वाले परिणाम देखने को मिले हैं। दिसंबर से फरवरी के बीच हुई बर्फवारी ने इन इलाकों में जैव विविधता पर मंडरा रहे खतरे को भी दूर कर दिया है।

जानकारों का कहना है कि इस बार हुई रिकॉर्ड बर्फबारी के चलते हिमालय की जैव विविधता को नया जीवन और स्नोलाइन रिचार्ज होगी । वहीं इस बर्फबारी का असर यह होगा कि इस साल नदी-झरने पानी से लबालब होंगे । जिन क्षेत्रों में नदियों पर आधारित पेयजल योजनाएं हैं, वहां पानी की किल्लत नहीं होंगी ।


 

 

 

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