Tuesday, November 20, 2018

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उत्तराखंड हाईकोर्ट ने दिया अहम फैसला, सभी नागरिकों को बताया पशुओं संरक्षक

अंग्वाल न्यूज डेस्क
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने दिया अहम फैसला, सभी नागरिकों को बताया पशुओं संरक्षक

नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने प्राकृतिक संसाधनों और पशुओं के स्वास्थ्य को लेकर एक बड़ा फैसला दिया है। हाईकोर्ट ने राज्य में हवा, पानी और धरती पर रहने वाले सभी जीवों को विधिक अस्तित्व का दर्जा देते हुए उत्तराखंड के समस्त नागरिकों को उनका संरक्षक भी घोषित किया है। वरिष्ठ न्यायमूर्ति राजीव शर्मा और न्यायमूर्ति लोकपाल सिंह की खंडपीठ ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान यह फैसला दिया है। इस दौरान कोर्ट ने वातावरण में हो रहे प्रदूषण और गंदगी की वजह से नदियों के सिकुड़ने औश्र लुप्त हो रही प्राणियों के अलावा पेड़-पौधों पर भी चिंता जताई है। 

गौरतलब है कि बनबसा चंपावत निवासी नारायण दत्त भट्ट ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की थी। नारायण दत्त ने अपनी याचिका में बनबसा से नेपाल के महेंद्रनगर की 14 किमी की दूरी में चलने वाले घोड़ा बुग्गी, तांगा, भैंसा गाड़ियों पर जरूरत से ज्यादा सामान ढोया जा रहा है ऐसे में इन जानवरों के स्वास्थ्य परीक्षण, टीकाकरण आदि की अपील की गई थी। इसके अलावा, याची ने इन बुग्गियों और तांगों से यातायात प्रभावित होने और इनके जरिये अवैध हथियारों, ड्रग्स और मानव तस्करी की आशंका जताई थी। 

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यहां बता दें कि याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि भारत और नेपाल सीमा पर इन जानवरों की किसी तरह की जांच नहीं की जाती है। ऐसे में भारत-नेपाल सहयोग संधि 1991 के प्रावधानों का उल्लंघन किया जा रहा है। गौर करने वाली बात है कि जनहित याचिका पर 13 जून को सुनवाई हुई थी लेकिन कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। बुधवार शाम कोर्ट की ओर से दिए गए फैसले में जानवरों की सुरक्षा को ध्यान रखते हुए समस्त जीवों को विधिक व्यक्ति का दर्जा देते हुए उन्हें मनुष्य की तरह अधिकार, कर्तव्य और जिम्मेदारियां देते हुए लोगों को उनका संरक्षक घोषित किया है। 

खंडपीठ ने नगर पंचायत बनबसा को निर्देश दिए हैं कि वे नेपाल से भारत आने वाले घोड़ों और खच्चरों का परीक्षण करें और सीमा पर एक पशु चिकित्सा केंद्र खोलें। साथ ही पंतनगर विवि के कुलपति को निर्देश दिए हैं कि पशुपालन विभाग के किसी उच्चाधिकारी की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय कमेटी बनाने के निर्देश दिए हैं। इसके साथ ही जानवरों के द्वारा खींचे जाने वाले वजन की सीमा निर्धारित की जाए। हाईकोर्ट के निर्देश 

प्रदेश के समस्त पशु, पक्षी, जलीय प्राणियों का हो विधिक अस्तित्व, मनुष्यों की भांति उनके भी अधिकार, प्रदेश का हर नागरिक पशुओं का अभिभावक घोषित। 

काम लिए जाने वाले पशुओं को हर दो घंटे में पानी, चार घंटे में भोजन देना आवश्यक, एक बार में 2 घंटे से ज्यादा पैदल चलाने पर रोक। 

पशुओं के स्वास्थ्य, भोजन, इलाज के साथ ही उनकी भावनाओं और संवेदनाओं का ध्यान रखना आवश्यक। 


सड़कों में वाहन चालक बैलगाड़ी और घोड़ागाड़ी को रास्ता दंेगे क्योंकि इससे ट्रैफिक बाधित होता है। 

बैलगाड़ी, घोड़ागाड़ी के आगे, पीछे एवं खींचने वाले पशु की सुरक्षा के लिए उनके शरीर पर रेडियम का कवर लगाना आवश्यक। 

किसी वाहन में 6 से अधिक पशु न लादे जाएं, साथ में एक अटेंडेंट व फर्श पर मैटिंग को आवश्यक करने को कहा गया है। 

पशुओं को हांकने के लिए चाबुक, नुकीली खूंटी, डंडे सहित किसी भी प्रकार की अन्य उत्पीड़क सामान के उपयोग पर रोक।

पशुओं के नाक, मुंह में लगाम लगाने पर रोक, केवल मुलायम रस्सी से गर्दन बांधने की अनुमति। 

बनबसा से नेपाल तथा नेपाल से बनबसा के बीच चलने वाली घोड़ागाड़ी के घोड़ों के स्वास्थ्य की नियमित जांच हो व प्रमाणपत्र जारी किए जाएं।

पशुओं द्वारा भार ढोने की सीमा निर्धारित

हाईकोर्ट ने पशुओं द्वारा खींचे जाने वाले वजन को भी निर्धारित किया है। छोटा बैल या भैंसा 75 किलो, मध्यम बैल या भैंसा 100 किलो, बड़ा बैल या भैंसा 125 किलो, टट्टृ 50 किलो, खच्चर 35 किलो, गधा 150 किलो, ऊंट 200 किलो। कोर्ट ने कहा कि मार्ग में चढ़ाई या ढलान होने पर यह सीमा इसकी आधी मानी जाय।  

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