Saturday, May 25, 2019

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उत्तराखंड - छात्रवृत्ति घोटाले में मंगलौर के कांग्रेस विधायक के भाई समेत 3 गिफ्तार , जहां इंस्टीट्यूट बताया वहां मिला खंडर

अंग्वाल संवाददाता
उत्तराखंड - छात्रवृत्ति घोटाले में मंगलौर के कांग्रेस विधायक के भाई समेत 3 गिफ्तार , जहां इंस्टीट्यूट बताया वहां मिला खंडर

देहरादून । अनुसूचित जाति - जनजाति के बच्चों को समाज कल्याण विभाग की ओर से मिलने वाली छात्रवृत्ति हड़पने के मामले में SIT ने मंगलौर विधायक काज़ी निजामुद्दीन के भाई काज़ी मोहियूद्दीन समेत तीन कॉलेज संचालकों को गिरफ्तार कर लिया है। आरोप है कि इन सभी ने साठगांठ करके समाज कल्याण विभाग की ओर से छात्रों को दी जाने वाली छात्रवृत्ति का घोटाला किया और ढाई करोड़ रुपये की छात्रवृत्ति हड़प ली। इस घोटाले की जांच कर रही एसआई ने मामले की जांच के बाद मंगलौर के कांग्रेसी विधायक काजी निजामुद्दीन के भाई काजी मोहियूद्दीन समेत देहरादून निवासी संजय बंसल और मंगलौर निवासी प्रदीप अग्रवाल पर शिकंजा कसा है।

अनुसूचित जाति-जनचाति के छात्रों का दिखाया दाखिला

बता दें कि इस घोटाले के उजागर होने के बाद से एसआईटी इस मामले की जांच कर रही थी। इस जांच में सामने आया है कि टेकवर्ड्स वली ग्रामोद्योग विकास संस्थान ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशन मंगलौर ने  वर्ष 2012 से 2015 के बीच अपने इंस्टीट्यूट में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के छात्रों के दाखिले दिखाए। इन छात्रों को समाज कल्याण विभाग की ओर से मिलने वाली छात्रवृत्ति का लाभार्थि दिखाते हुए करीब 2,54,10,440 रुपये की छात्रवृति हड़पते हुए विभाग को चूना लगाया।

आरोपी संस्थानों के अध्यक्ष, सचिव


इस दौरान जांच में सामने आया है कि इस घोटाले में गिरफ्तार किए गए आरोपी संजय बंसल देवभूमि गुरुप ऑफ इंस्टीट्यूट देहरादून के चेयरमैन भी हैं। वहीं अन्य संस्थानों के अध्यक्ष और सचिव थे। उन्होंने समाज कल्याण विभाग की छात्रवृत्ति अनुसूचित जाती और जनजाति के छात्रों को देने के नाम पर विभाग को करोड़ों का चूना लगाया।

सत्यापन में खंडर मिला

इससे इतर एसआईटी ने हरिद्वार के एक तीसरे निजी संस्थान के खिलाफ भी जांच की। इस दौरान सामने आया कि जिस जगह पर संस्थान ने अपनी इमारत बताई हुई थी उस जगह पर महज खंडर था। इस संस्थान ने एमबीए, बीबीए, बीसीए, बीएससी, आईटी के कोर्स संचालित करने के लिए वर्ष 2011 में उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय में आवेदन किया था, लेकिन उन्हें मान्यता नहीं मिली थी।

 

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