Sunday, November 19, 2017

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क्या घरेलू सहायिकाएं बन गईं हैं सशक्त वर्किंग वुमन

अंग्वाल न्यूज डेस्क
क्या घरेलू सहायिकाएं बन गईं हैं सशक्त वर्किंग वुमन

ताजा चमेली के फूलों की खुषबू से घर महकने लगा। पायल की रुणझुण आवाज पूरे घर में गूंजने लगी। मुझे पता चल गया, वो आ चुकी है। लिपि, मेरी डोमेस्टिक हेल्प... एक चमकता खुश चेहरा, माथे पर लाल बिंदी, मांग में सिंदूर की रेखा, गीले बालों को निपुणता से एक जुडे में बांधा है और उस पर लगाया है चमेली का गजरा, कानों में झुमके और गले में एक लंबासा मंगलसूत्र। उसके शरीर में एक पारंपरिक भारतीय शादी-शुदा औरत की हर निशानी मौजूद थी लेकिन उसकी सोच ने मुझे हैरान कर दिया। 

कहती है.... आप भी तो तैयार होकर अपने काम पर जाती हो। मैं भी आयी हूँ। अच्छा लगता है और वो जो खिटरपिटर वाली भाभी लोग होते हैं और जो हमारे पीछे घूमने वाले उनके पति लोग.... किसी से भी डर नहीं लगता। 

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मेरी एक सहयोगी मुझे याद आ गई। किसी भी बड़ी मीटिंग में जाने से पहले लिपस्टिक का एक फ्रेश कोट जरूर लगा लेती थी वो। कहती थी ऐसा करने से मीटिंग में आए उसके पुरुष  प्रतिद्वंद्वियों का सामना करने में उसे हिम्मत मिलती है। आज मुझे पहली बार एहसास हुआ,  हर रोज घर या कर्मक्षेत्र में पुरुष सत्तात्मक मानसिकता वाले लोगों से निपटने के हमारे और लिपि के तरीके कितने मिलते हैं। सोचने लगी, इस बात पर नारीवादी क्या कहेंगे जो सोचते है जेवरात पुरुष सत्तात्मक समाज के बनाई जंजीरे हैं, बंधकता का प्रतीक, लेकिन असल जिंदगी में कभी-कभी ऋंगार औरत का हथियार या कवच भी होते है। लिपि कहती है ... भाभी, औरत की सज-धज कौन आदमी देखता है? आदमी लोग का देखने का तरीका कुछ और ही है । 

सच कहा उसने। औरतों की ये बिंदी, लिपस्टिक, झुमके बस औरतों के ही नजर में आते है। कुछ नीच प्रवृत्ति के पुरुषों को तो न बिंदी दिखती है, ना झुमके। दिखता है तो सिर्फ एक औरत का शरीर। वो कितनी भी बदसूरत क्यों ना हो। 16 की हो या 70 की। ऐसा ना होता तो क्या वृंदावन में रहनेवाली गरीब 70 साल की विधवा का बलात्कार होता? अब सवाल यह है कि फिर कुछ लोग क्यों कहते है के औरतों का ऋृंगार ही पुरुषों को उकसाता है?

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लिपि 10 घर में काम करती है, सुबह 6.30 बजे से रात 8.30 बजे तक क्योंकि बेटी को अंग्रेजी स्कूल में पढ़ाती है। इतना काम करती है ताकि उसकी फीस भर सके। बेटी को कामवाली नहीं एक ऑफिसवाली बनाना चाहती है। अपने सशक्तिकरण से बेटी को भी सशक्त बनाना चाहती है। हैरानी हुई कि उसके पति ने भी उसका साथ दिया।

कहती है .....मैं लेट हो जाती हूँ इसलिए मेरा पति मेरे लिए खाना बनाकर रखता है। मैं मछली के बिना खाना नहीं खा सकती। इसलिए हर रोज वो मच्छी बनाता है। एक मछली बेचने वाला दूसरा घरेलु मददगार। पढ़ा-लिखा कोई भी नहीं लेकिन स्त्री-पुरुष के समानता और सच्चे साझेदारी को बखूबी निभा रहे हैं। जो समाज के उच्च श्रेणी के परिवारों में भी विरल है। जो छवि बनी हुई है कि समाज के इस तरह के परिवारों में सिर्फ आदमी पीकर औरतों पर हाथ उठाता है और गाली-गलौच करता है। जहाँ औरत की हर वक्त बेइज्जती होती है वह आज टूट गई। उम्मीद बनी कही-कही तो बदलाव आ रहा है। 

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बस कहानी यही खत्म नहीं होती ...... लिपि एक महिला एक्टिविस्ट भी है। घरेलू मदद महिलाओं के एक ग्रूप का भी नेतृत्व करती है। अपने घर या कर्मक्षेत्र में अपने हक्क के लिए लड़ती है । इनमें समानताएँ इतनी हैं कि एक बार मेरी पडोसन ने किसी को काम से निकाल दिया था तो इनमें से किसी ने भी अगले 6 महीने तक उस घर में काम नहीं किया। मेरी पडोसन ने पैसों का लालच भी  दिया  लेकिन कोई राजी नहीं हुई। ऐसी समानता शायद पढ़े-लिखे नारीवादियों में भी देखने को ना मिले ।

क्या कहेंगे इन्हें? सिर्फ कामवाली या नारीवादी सशक्त वर्किंग वुमन,  एक हाथ में बड़ा हैंडबैग और दूसरे हाथ में मोबाइल लिए, दृढता के ढाल पहने जब लिपि निकलती है, तो वो सचमुच हम जैसी एक वर्किंग वुमन ही तो है। इनके सामने सिंदूर ना लगाना, पति के नाम का इस्तेमाल ना करने को नारीवाद समझने वाले तुच्छ और खोखले लगते है। इन घरेलु मदद महिलाओं के आत्मविश्वास अपने ह के लिए लड़ने की क्षमता और महिला संघ देख कर यही लगता है कि नारीवाद का सच्चा मतलब शायद सिर्फ इन्हें ही समझ आया है।

प्रस्तुति- सास्वति डी. मिश्रा

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