Friday, April 20, 2018

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मेरे सवाल का जवाब दो- मां अपने मम्मी-पापा के साथ नहीं रहती पर पापा तो रहते हैं...क्यों...

मेरे सवाल का जवाब दो- मां अपने मम्मी-पापा के साथ नहीं रहती पर पापा तो रहते हैं...क्यों...

धुंधली हो गई वो बचपन की यादें , फिर भी याद है मुझे वो दिन जब मैंने मेरी माँ से पूछा था - ’मम्मी तुम अपनी मम्मी-पापा के साथ क्यों नहीं रहती हो। ’ मम्मी ने जवाब नहीं दिया था,  मुस्कुराकर वापस पूछा था,  मैं  मेरे मम्मी-पापा के पास चली गई तो तुम और तुम्हारे पापा का ख्याल कौन रखेगा? मैं भी सोचने लगी, सही बात है, मम्मी के बिना तो मैं बिलकुल नहीं रह सकती। चुप हो गई मैं, लेकिन होठ़ों पर एक और सवाल आ ही गया। ...पर पापा, वो क्यों अपने मम्मी-पापा के साथ रहते हैं?  मम्मी इस बार सिर्फ मुस्कुराई लेकिन जवाब नहीं दिया। 

आगे समय गुजरता गया। मम्मी से बहुत सवाल किए। मां ने कभी जवाब दिया तो कभी नहीं दिया। लेकिन एक बात जरुर थी कि उन्होंने  कभी मुझे सवाल करने से रोका नहीं।

मैं बड़ी हो गई और एक दिन मेरी भी शादी हो गई। मम्मी की वो खामोश मुस्कुराहट का मतलब मुझे तब जाकर पता चला। भारतीय समाज में,  कई रीति रिवाजों से बंधी होती है एक औरत। लेकिन क्या हर रीत औरत के हक में बनाई गई है? जो मन सवाल करने का आदी हो चुका है, वो सवाल तो करेगा ही पर आज सामने मेरी मां नहीं खड़ी थी।

पितृ सत्तात्मक समाज औरतों के सवालों का जवाब देना जरुरी नहीं समझता, बल्कि उन्हें चुप करा देना ही सटीक लगता है। औरत को कभी भी प्रश्न नहीं पूछना चाहिए सिर्फ आदेश का पालन और कर्तव्य का निर्वाहन करना चाहिए। यही सुशील लड़की का चलन है। फिर जो प्रश्न करती है वो? वो तो बदचलन हो गईं ना,  चरित्र ही खराब हो गया। इस सोच से डरकर लड़कियां हमेशा खामोश रह जाती हैं। 


लेकिन शादी के बाद नए माहौल में सवाल तो हर लडकी के मन में उठते ही हैं। कई सवाल जिनके जवाब मिल जाए तो जिंदगी आसान हो जाए। पर जिन लड़कियों की आवाज बचपन में ही खामोश कर दी जाती है वो कभी भी अपनी मन की जिज्ञासाओं का सामना नहीं कर पातीं। अंदर ही अंदर घुटती रहती हैं। कभी साहस करती भी है तो थोडे से गरजते ‘बादल’ का सामना होते ही किसी छाते के नीचे मुंह छूपा लेती हैं। डरती है कहीं बारिश में इस छाते का आसरा भी न खो जाए। लेकिन कब तक औरत  हक मांगना तो दूर की बात है , अपने वजूद को एक पहचान दिलाने के हक से सवाल को उठाने की भी हिम्मत कर पाएगी? 

नेशनल फॅमिली हेल्थ सर्वे (2005-06 ) के  अनुसार, ग्रामीण क्षेत्र में सिर्फ 26 फीसदी शादशुदा औरतें ही अपने स्वास्थ्य संबधी फैसले ले पाती हैं। सिर्फ 7.6 फीसदी घरों में ही महंगे सामान की खरीददारी में औरतों की राय ली जाती है। सिर्फ 10 फीसदी महिलाएं अपने मायके जाने का निर्णय खुद से ले पाती हैं। 

 

हालांकि 10 साल बाद हुए नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (2015-16) के अनुसार, औरत सशक्तिकरण के क्षेत्र में सुधार आया है। लेकिन आज भी ग्रामीण क्षेत्र में 31.5 फीसदी लडकियों का बालविवाह कर दिया जाता है। हरियाणा और तमिलनाडू जैसे राज्यों में परिवार में लिए गए फैसलों में औरत का योगदान घटा है। जनधन योजना के तहत काफी संख्या में औरतों ने अपना बैंक खाता खोला है। सर्वे के अनुसार 53 फीसदी औरतों ने अपना खाता खोला लेकिन ये प्रयास तो तभी सफल माना जाएगा जब इन खातों को खुद महिलाएं ही ऑपरेट करें। लेकिन इसका विरोध करने की हिम्मत भी अभी तक महिलाओं में पूरी तरह से नहीं आई है।

सोचिए जरा! क्या हम हर बेटी को ऐसी हिम्मत दिला सकते हैं कि उसके साथ हुई हर गलती पर वो सवाल कर सके और हक से जवाब मांग सके? सवाल करना हर इंसान का जन्मसिद्ध अधिकार है। तो बेटियों को ये अधिकार क्यों नहीं मिलेगा? 

         प्रस्तुति-सास्वति डी. मिश्रा

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