Monday, July 13, 2020

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115 सालों से बंद महाराणा स्कूल के कमरों से मिला 'अकूत खजाना' , कबाड़ समझकर नहीं खोले कमरे

अंग्वाल न्यूज डेस्क
115 सालों से बंद महाराणा स्कूल के कमरों से मिला

जयपुर । इतिहास के पन्नों में दर्ज धौलपुर के महाराणा स्कूल के कुछ कमरों को पिछले दिनों 115 साल बाद खोला गया । इतने सालों तक इन कमरों को इसलिए नहीं खोला गया था क्योंकि स्थानीय प्रशासन यह समझता था कि इनमें कबाड़ पड़ा होगा , लेकिन हाल में जब 2-3 कमरे खोले गए तो, वहां मौजूद 'खजाना' देख लोगों को होश उड़ गए । असल में इन कमरों से इतिहास की ऐसी धरोहरें रखी गई थीं, जो आज बेशकीमती हैं । इन कमरों से प्रशासन को ऐसी किताबें मिली हैं , जो एक दशक से ज्यादा पुराने समय की हैं । इन किताबों की आज अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत करोड़ों की है । इन किताबों में कई ऐसी किताबें हैं, जिनमें स्याही की जगह सोने के पानी का इस्तेमाल किया गया था। इतिहासकार इस अनोखे खजाने को लेकर बहुत उत्साहित हैं । उनका कहना है कि इन किताबों को सहेज कर रखना जरूरी है , ताकि भविष्य में इन किताबों से छात्रों को बहुत अहम जानकारी मिले ।  

बता दें कि  कड़ाब जानकर, धौलपुर के जिन स्कूली कमरों को 115 साल से खोला नहीं गया था, उस कमरे में किताब रुपी खजाना मिला है । धौलपुर के महाराणा स्कूल के जब बंद कमरे खुले तो उससे किताबों का ऐसा खजाना मिला कि स्थानीय प्रशासन के अफसरों की आंखें खुली की खुलीं रह गईं ।  स्कूल के दो से तीन कमरों में एक लाख किताबें तालों में बंद पड़ी मिली। 


अधिकांश किताबें किताबें 1905 से पहले की हैं । बताया जा रहा है कि महाराज उदयभान दुलर्भ पुस्तकों के शौकीन थे । ब्रिटिशकाल में महाराजा उदयभान सिंह लंदन और यूरोप यात्रा में जाते थे । तब ने इन किताबों को लेकर आते थे । 

जानकारी के अनुसार , इन किताबों में कई किताबें ऐसी हैं जिनमें स्याही की जगह सोने के पानी का इस्तेमाल किया गया है । 1905 में इन किताबों के दाम 25 से 65 रुपये का है । जबकि उस दौरान सोना 27 रुपये तोला था। ऐसे में मौजूदा समय में इन 1-1 किताब की कीमत लाखों में आंकी जा रही है । सभी पुस्तकें भारत, लंदन और यूरोप में छपी हुई हैं । 

इनमें से एक किताब  3 फीट लंबी है , जिसमें पूरी दुनिया और देशों की रियासतों के नक्शे छपे हैं । खास बात यह है कि किताबों पर गोल्डन प्रिंटिग है । इसके अलावा भारत का राष्ट्रीय एटलस 1957 भारत सरकार द्वारा मुद्रित, वेस्टर्न-तिब्बत एंड ब्रिटिश बॉडर्र लेंड, सेकड कंट्री ऑफ हिंदू एंड बुद्धिश 1906, अरबी, फारसी, उर्दू और हिंदी में लिखित पांडुलिपियां, ऑक्सफोर्ड एटलस, एनसाइक्लोपीडिया, ब्रिटेनिका, 1925 में लंदन में छपी महात्मा गांधी की सचित्र जीवनी द महात्मा भी इन किताबों में निकली है । 

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