Friday, January 17, 2020

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भाजपा ने प्रियंका को घेरने के लिए बनाया नया चक्रव्यूह , अमित शाह ने रची नई रणनीति 

अंग्वाल न्यूज डेस्क
भाजपा ने प्रियंका को घेरने के लिए बनाया नया चक्रव्यूह , अमित शाह ने रची नई रणनीति 

लखनऊ । वर्ष 2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को मिली प्रचंड जीत के बाद विधानसभा चुनावों में भी भाजपा की आंधी चली थी। हालांकि अब पार्टी के कई नेता मानते हैं कि पिछले साढ़े चार साल के कार्यकाल के दौरान भाजपा सरकार के फैसलों को लेकर और विपक्षी दलों के गठबंधन को ध्यान में रखते हुए पार्टी पहले जैसा प्रदर्शन शायद न दोहरा पाए। इस सब के बीच कांग्रेस ने चुनावों से पहले अपना मास्टर स्टोक चलते हुए प्रियंका गांधी वाड्रा को पार्टी का महासचिव बनाते हुए उन्हें पूर्वी उत्तर प्रदेश का प्रभार सौंपा गया है। ऐसे में भाजपा के चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह ने कांग्रेस को घेरने के लिए एक नई रणनीति पर काम करना शुरू कर दिया है। इसके पहले चरण के तौर पर अब पार्टी अध्यक्ष अमित शाह यूपी में बूथ लेवल कार्यकर्ताओं और करीब 50 हजार से ज्यादा पार्टी के निचले क्रम के पदाधिकारियों से मुलाकात करेंगे। इस दौरान इन नेताओं के साथ रणनीति पर चर्चा की जाएगी। इस दौरान राज्य में सवर्णों के साथ ओबीसी , एससी-एसटी , अल्पसंख्यक को साधने की रणनीति के तहत पदाधिकारियों को अलग-अलग जिम्मेदारी दी जाएगी।

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प्रियंका को घेरने की रणनीति

जहां एक ओर प्रियंका गांधी प्रदेश में कांग्रेस के खोते अस्तित्व को बचाने के लिए अपनी नई रणनीति लेकर आने वाली हैं, वहीं भाजपा ने भी प्रियंका को घेरने के लिए अपनी रणनीति बना ली है। भाजपा कांग्रेस में परिवारवाद का मुद्दा उठाते हुए प्रियंका को सीधे पार्टी महासचिव बनाए जाने का मुद्दा जमकर अपनी रैलियों में उछालने वाली है। इतना ही नहीं वह प्रियंका को सक्रिय राजनीति में उतारने के पीछे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के फेल होने का भी जमकर प्रचार करेगी। हो सकता है कि लोकसभा चुनावों के अंतिम दौर में प्रियंका को उनके पति रॉबर्ट वाड्रा के राजस्थान में जमीन घोटाले मुद्दे को लेकर भाजपा घेरती नजर आए। 

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इस बार दलित नहीं सवर्ण वोट होंगे निर्णायक


इस बार ऐसा माना जा रहा है कि यूपी में दलित वोटों के बजाए इस बार सवर्ण जाति के लोगों का वोट निर्णायक साबित होगा। सपा-बसपा के गठबंधन के बाद यूपी में कांग्रेस अपने बूते अलग चुनाव लड़ेगी, जबकि अन्य छोटे-छोटे दल के नेता भी अपनी पार्टियों और निर्दलीय रूप से चुनाव लड़ेंगे। रणनीतिकार मान रहे हैं कि इस बार सपा-बसपा के गठबंधन होने के चलते पिछले 5 सालों से चुनावों की तैयारी कर रहे कुछ उम्मीदवार टिकट न मिलने पर नाराज हो सकते हैं। ऐसे में अगर वो बागी रूप में मैदान में उतरे तो उससे गठबंधन को ही नुकसान होगा, ऐसी स्थिति में सवर्णों का वोट अहम हो जाएगा। 

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कांग्रेस की नजर भी सवर्ण वोटों पर

असल में यूपी में कांग्रेस का कोई वोट बैंक बचा नहीं है, दलित और अल्पसंख्यक जहां सपा-बसपा गठबंधन के साथ जा सकते हैं, वहीं यूपी के जाट कुछ जगहों पर रालोद के साथ तो कुछ जगहों पर भाजपा को समर्थन दे सकते हैं। अब अगर अगड़ी जाति के मतदातों की बात करें तो, जहां काग्रेस का पूरा जोर उनसे नाराज होकर भाजपा को वोट देने वाले मतदाताओं पर होगी, तो भाजपा अपने सवर्ण मतदाओं के साथ ओबीसी , दलित , अल्पसंख्यक वोटों पर नजर बनाए हुए है।

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