Friday, July 19, 2019

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तेजस्वी यादव ने चली बड़ी 'सियासी चाल' , तीर निशाने पर लगा तो राष्ट्रीय राजनीति में राहुल-अखिलेश के बराबर हो सकता है कद

अंग्वाल न्यूज डेस्क
तेजस्वी यादव ने चली बड़ी

पटना । बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री और राजद के वर्तमान में बड़े नेताओं में शुमार हो चुके तेजस्वी यादव इन दिनों खुद को कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव की लाइन में खड़ा करने की कवायद में जुटे हैं। बिहार की राजनीति में इस दिनों खासी दखल रखने वाले और अपनी पार्टी के कई बड़े नेताओं के बावजूद सर्वमान्य नेता बनते जा रहे तेजस्वी यादव ने अपनी चुनावी रणनीतियों के तहत ऐसी सियासी चालों को अंजाम देना शुरू कर दिया है, जिससे वह आने वाले समय में कांग्रेस - सपा अध्यक्षों के बराबर खुद को खड़ा कर सकते हैं। असल में सियासी समीकरणों को समझते हुए तेजस्वी ने पिछले दिनों बसपा सुप्रीमो मायावती के जन्मदिन पर न केवल उन्हें शुभकामनाएं दी बल्कि उनसे मार्गदर्शन करने को भी कहा। उनका मायावती से मिलना महज एक राजनीतिक मुलाकात नहीं बल्कि तेजस्वी की आगामी लोकसभा चुनावों को लेकर रची एक रणनीति है। तेजस्वी ने मायावती से आशिर्वाद लेकर आगामी चुनावों में उन्हें बिहार में अपने मंच पर खड़ा करने की जुगत लगाई है। ऐसा करके वह बिहार में दलितों के नेताओं के रूप में भी खुद को स्थापित करने की रणनीति बनाए हुए हैं।

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असल में उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनावों के मद्देनजर सपा-बसपा का गठबंधन हो गया है। 80 सीटों में से दोनों दलों ने एक दूसरे को 38-38 सीटें दी है, जबकि दो सीटें कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी के लिए खाली छोड़ी गई हैं। दोनों पार्टियों का मानना है कि इससे कांग्रेस अध्यक्ष और पूर्व अध्यक्ष को अपनी सीट की चिंता नहीं करनी होगी और वो दूसरे क्षेत्रों में प्रचार कर सकेंगी । हालांकि इस गठबंधन से दोनों ही दलों ने कांग्रेस को शामिल नहीं किया है। लोकदल के लिए यूं तो 2 सीटें छोड़ी हैं , लेकिन पार्टी लोकदल इस पर सहमत नहीं है। 

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    अब अगर बात बिहार की करें तो लोकसभा चुनावों के मद्देनजर यहां भाजपा-जदयू के सामने राजद ही एक बड़ा दल है। अब जिसे भी विपक्ष में खड़ा होना है उसे राजद के बैनर तले आना होगा। अब बिहार में दलित वोटों को साधने के लिए तेजस्वी यादव चाहते हैं कि बसपा राजद द्वारा तैयार किए जा रहे महागठबंधन के तले आ जाए । इससे उनका गठबंधन दलितों का शुभचिंतक बनकर उभर सकता है। अभी रालोसपा के इस गठबंधन में शामिल होने के बावजूद कई दलित वोट उनके समर्थन में आते नजर नहीं आ रहे हैं। ऐसे में तेजस्वी यादव चाहते हैं कि मायावती उनके गठबंधन में शामिल होकर दलितों के वोट पूरी तरह एक तरफ कर सकें। 

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    अगर ऐसा ही तो बिहार में महागठबंधन मजबूत स्वरूप धारण कर सकेगा , इतना ही नहीं अगर लोकसभा में राजद के नेतृत्व वाले महागठबंधन को 40 में से अच्छी सीट मिल पाईं तो वह अपने लिए कई नए रास्ते खोल सकती है। राजद के ज्यादा सीटें जीतने की सूरत में कहीं न कहीं तेजस्वी यादव का वजूद अखिलेश और राहुल गांधी की कतार वाला हो जाएगा। ऐसा इसलिए कि अखिलेश जिस पार्टी का नेतृत्व कर रहे हैं, उसकी पार्टी के पास लोकसभा की सीटें अभी परिवार के लोगों की हैं, जबकि देश की सबसे पुरानी राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस के पास भी ज्यादा लोकसभी सीटें नहीं हैं।        

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