Monday, August 26, 2019

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मोहम्मद रफी की 39वीं पुण्यतिथि पर विशेष - एक गायक, जो लोगों को जीने की राह दिखा गया  

अंग्वाल न्यूज डेस्क
मोहम्मद रफी की 39वीं पुण्यतिथि पर विशेष - एक गायक, जो लोगों को जीने की राह दिखा गया  

प्रस्तुति - प्रवीन जोशी

यूं तो हिंदी फिल्मों के संगीत का इतिहास 1937 से माना जाता है, जब मूक फिल्मों के बाद बोलती फिल्मों की बड़े पर्दे पर शुरुआत हुई । इनकी मदद से हिंदी फिल्मों का दायरा बढ़ गया । उस दौरान नई फिल्मों में संगीत की कलाओं का भी इस्तेमाल किया जाने लगा । जहां बैकराउंड म्यूजिक ने फिल्मों में जान फूंक दी , वहीं गीतों ने फिल्म जगत को एक बड़ा मौका दे दिया । फिल्म कारोबार को गति मिलने लगी । हिंदी गानो के सहारे फिल्म आगे बढ़ती थी । केएल  सहगल , सुरेंदर , राजकुमारी , सुरैय्या , शमशाद बेगम , नूरजहां शुरूआती दौर के प्रसिद्ध  गायक गायिकाओं में से थे । लेकिन नए दौर के साथ नए अभिनेताओं और अभिनेत्रियों ने बड़े पर्दे पर अपना जलवा दिखाना शुरू कर दिया, जिन्हें गीतों के जरिए आवाज देने लगे  मुकेश , तलत मेहमूद , हेमंत कुमार , मन्ना डे  , किशोर कुमार और मोहम्मद रफी। 

इन दिग्गज गायकों में से एक बहुप्रतिभा के धनी गायक मोहम्मद रफी को 31 जुलाई को इस दुनिया से रुखसत किए 39 साल हो रहे हैं। वह एक ऐसे गायक थे कि जिस कलाकार की आवाज़ बनते , उसे स्टार बना देते । ऐसा लगता था मानों अभिनेता खुद वह गाना गा रहा हो । क्या जॉनी वॉकर और क्या मेहमूद , क्या धर्मेंद्र , शम्मी कपूर , देव आनंद और क्या दिलीप कुमार । ऐसा लगता था की ये कलाकार गाना गाते समय रफी साहब में समा जाते थे । एक ऐसा गायक जिसे सुरो के राजा , सिंगर ऑफ़ द मिलेनियम , सर्व कला गुण सपन्न कहा जाता रहा । रफ़ी साहब के बारे में इतना कुछ पहले ही लिखा जा चूका है की कुछ और  क्या लिखें , शब्द कम पड़ जाते हैं , फिर भी दिल है की मानता नहीं कुछ लिखे बिना । रफ़ी साहब को हिंदी फिल्मो का तानसेन कहा जाये तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। उनकी गिनती ऐसे गायकों में है जो लोगों को जीने की राह दिखा गए।

एक ऐसा गायक जिसने सबसे ज्यादा धार्मिक गीत गाए और वो सब के सब हिट भी साबित हुए ।  उसने जब राम भजन गया (सुख के सब साथी , दुःख मे न कोई ) तो सब राममय हो गए , उसने जब देखभक्ति गीत गाया (कर चले हम फ़िदा जानो तन साथियो ,  ऐ वतन ऐ वतन हमको तेरी कसम , आवाज़ दो हम एक हैं ) तो देशभक्ति की ज्वाला दिलों मे धधकने लगती है । क्या रोमांस क्या ग़ज़ल , क्या शाष्त्रीय गीत... क्या क़व्वाली , क्या ऊँचे स्वर के गीत , सुरो की किताब में कोई ऐसा राग नहीं था जिसको रफ़ी साहब ने न गाया हो । हर बड़े छोटे स्टार को उन्होंने अपनी आवाज़ देके उनको हिट करने में बड़ा योगदान दिया । 

रफी साहब अपने फन के बड़े माहिर थे , सुरों पे उनकी जितनी बादशाहत थी उतनी ही अपनी असल ज़िंदगी में भी थी , एक नेक दिल , सीधा साधा स्वभाव और चेहरे पर हर समय एक मीठी सी मुस्कान । 

कई दौर आये कई दौर गए , कई सिंगर आये कई गए , बहुत से महान सिंगर भी हुए पर रफी साहब जैसा सिर्फ एक बार जन्म लेता है ।


हालांकि ये भी कहा जाता है कि 1970 -80 के दशक में जब  किशोर दा अपने चरम पर थे उस समय रफ़ी साहेब हाशिये पर थे । लेकिन यह सत्य से बिलकुल परे है । इसमे कोई दो राय नहीं कि किशोर दा बेहद अद्भुत प्रतिभा के स्वामी थे । उनके गायन की शैली अनोखी थी , लेकिन रफ़ी साहब ने उस दौर में भी जबरदस्त हिट गीत दिए जो आपकी जानकारी के लिए नीचे लिख रहा हूँ । 

" क्या हुआ तेरा वादा , वो कसम वो इरादा" , ये जो चिलमन है दुश्मन है हमारी , चुरा लिया है तुमने जो दिल को , आज मौसम बड़ा बईमान है बड़ा , तेरी बिंदिया रे , इतना तो याद है मुझे , गुलाभी आंखें जो तेरी देखि , यूँही तुम मुझसे बात करती हो , ये रेशमी ज़ुल्फ़ें , हम किसी से कम नहीं कम नहीं , नफरत की दुनिया को छोड़कर , मैं जट यमला पगला दीवाना , आज मेरे यार की शादी है , चलो रे डोली उठाओ कहार , छुप गए सारे नज़ारे , कोई नज़राना लेकर आया हूँ मैं , हाय रे हाय नींद नहीं आये , खुश रहे तू सदा , खिलौना जानकार तुम तो , सुख के सब साथी , ये दुनिया ये महफ़िल , तुम जो मिल गए हो और तेरी गलियों में न रखेंगे कदम ।

ये लिस्ट और भी लम्बी है पर इन खूबसूरत गीतों के बारे में जितना लिखा जाये उतना कम है। लेकिन जो इंसान जिसका हक़दार है उसको उस चीज़ से मरहूम नहीं रखा जा सकता ।

ये ज़िक्र जब चला है तो काफी  लोग जानते ही होंगे की रफ़ी साहब दिल के कितने भोले और सीधे थे , कई नए नए संगीतकार ऐसे थे जो रफ़ी साहेब से गवाना चाहते थे पर रफ़ी साहब की फीस देने के लायक पैसे न होने के कारण वो उनसे बात तक नहीं पाते थे । तब रफ़ी साहेब उनके पास खुद जाते थे कई बार उनको अपने पास बुलवा लेते थे  और उनके गीत फ्री में गाते थे । नौशाद  साहेब ने एक बार कहीं बताया था की रफ़ी साहेब जब अपने लंदन के शो (रफ़ी साहब का आखिरी टूर ) से वापस आये तो नमाज़ियों के लिए चटाईंयां लेकर आये , कहते थे की नमाज़ियों को धुप  में नमाज़ पढ़नी पड़ती है. तो ऐसे थे रफ़ी साहेब।

रफ़ी साहेब , मन्ना डे  और किशोर दा के अच्छे दोस्त थे । रफ़ी साहेब और मन्ना डे  अक्सर एक साथ पतंग उड़ाया करते थे । इन महान गायको का आपस में बहुत प्यार था और किसी तरह का कोई आपसी मन मुटाव नहीं था । मन्ना डे तो अक्सर कहते थे ही की रफ़ी साहेब जैसा सिंगर कभी नहीं हो सकता । ऐसे कई तमाम किस्से हैं जिनका ज़िक्र चलेगा तो थमने का नाम नहीं लेगा ।  वैसे  भी रफ़ी साहेब के बारे में जितना लिखा जाए कम है । मेरी तरह रफ़ी साहेब के चाहने वाले आज भी यही यक़ीन रखते हैं की रफ़ी साहेब उनके आस पास ही हैं । मैं अपना लेख रफ़ी साहेब के गाये अंतिम गीत के साथ खत्म करता हूं।

" तेरे आने की आस है दोस्त , शाम फिर क्यू उदास है दोस्त ' .महकी महकी फ़िज़ा ये कहती है , तू कहीं आस पास है दोस्त "

 

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