Monday, January 25, 2021

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मुहल्लों में गपशप का अड्डा होते हैं 'जनता स्टोर', जहां होती है देश-दुनिया बदलने की प्लानिंग - नवीन चौधरी

अंग्वाल संवाददाता
मुहल्लों में गपशप का अड्डा होते हैं

एक मार्केंटिंग प्रोफेशनल जो बिहार में पैदा हुआ लेकिन उसकी पढ़ाई राजस्थान में हुई। पत्रकारिता में अपना करियर बनाना चाहता था लेकिन घर से निकला तो MBA करने । इस समय नौकरी अंग्रेजी में करता है, लेकिन हिंदी ब्लागरों के बीच अपनी पकड़ बना रहा है। कभी छात्र राजनिति में सक्रिय रहा तो आज फोटोग्राफी उन्हें अपनी ओर खींचती है। कहते हैं कि पढ़ाई में ज्यादा मन नहीं लगाया लेकिन इन दिनों मैनेजमेंट कॉलेज में जाकर गेस्ट लेक्चर देते हैं। ...जी हां हम बात कर रहे हैं एक अंतरराष्ट्रीय पब्लिशिंग हाउस के मार्केंटिंग हैड नवीन चौधरी की, जो इन दिनों अपनी पहली किताब ‘जनता स्टोर’ को लेकर सुर्खियों में हैं...उनकी इस किताब को प्री-ऑर्डर के पहले 24 घंटे में ही अमेज़न के इंडियन राइटिंग बेस्टसेलर केटेगरी में 34 रैंक हासिल हुई है। उनके और उनकी इस किताब के सफरनामे पर बात की अंग्वाल संवाददाता ने।

2018 में जब बाजारों में डिपार्टमेंटल स्टोर का कब्जा हो चला है ऐसे में आपकी किताब का शीर्षक जनता स्टोर क्यों...?

हमारे मोहल्ले में ऐसी दुकान होती हैं जहाँ आप किसी भी समय आँख मूँद कर पहुँच सकते हैं। जनता स्टोर हम सब की जिन्दगी का एक हिस्सा है।जनता स्टोर जैसी दुकानें मुहल्ले के लोगों के खड़े होकर गपशप करने का अड्डा भी होती हैं, जहाँ लोग देश-दुनिया बदलने की पूरी प्लानिंग कर लेते हैं । फिर राशन लेकर अपने घर आ जाते हैं। मेरी ये कहानी विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति पर आधारित है और जनता स्टोर ऐसा ही एक अड्डा है जहाँ पर छात्र विश्वविद्यालय से लेकर अमेरिका तक की राजनीति, प्रोफेसर से लेकर चपरासी तक की प्रेम कहानी की चर्चा करते हैं और फिर चाय पानी करके वापस आ जाते हैं।

तो क्या आपकी कहानी पुराने दशक पर आधारित है...?

जी हैं...कहते हैं ना ओल्डइज गोल्ड, हम हिन्दुस्तानी लोग नई चमक-दमक की चीजों को पसंद तो करते हैं लेकिन पुरानी चीजों को नहीं भूलते। गायक मीका और बादशाह के जमाने में भी किशोर, रफ़ी और मुकेश हमारे दिलों के करीब हैं। ऐसा ही कुछ जनता स्टोर के साथ भी है। कितने ही डिपार्टमेंटल स्टोर खुल जाएँ, जनता स्टोर जैसी जगहें आपको nostalgic कर देती हैं।

तो क्या आपकी किताब का शीर्षक नास्टैल्जिया के कारण है ?

जनता स्टोर नाम सिर्फ इस अड्डे या नास्टैल्जिया के कारण नहीं है। इस नाम के पीछे एक गूढ़ अर्थ भी है। यूनिवर्सिटी के पास बापू नगर में स्थित जनता स्टोर मार्केट से जनता स्टोर नाम की दुकान कब की गायब हो चुकी है पर उस मार्केट को जनता स्टोर ही कहा जाता है। बिलकुल उसी तरह जिस तरह जनतंत्र से जन गायब हो गया है पर तंत्र उसे अब भी जनतंत्र कहता है। मेरी कहानी छात्र राजनीति के उसी भीतरखाने की बातें बताती है जिसे पढ़ के पता लगता है कि छात्र राजनीति में राजनीति तो है पर छात्र नहीं।

जनता स्टोर को लिखने की प्रेरणा कहां से मिली?

छात्र राजनीति से जुडीं  अधिकतर किताबें जो मैंने पढ़ी वो राजनीति से ज्यादा प्रेम कहानियां बनकर रह गईं। उनसे छात्र राजनीति का वो इनसाइट नहीं मिलता जो मिलना चाहिए।  मैं खुद छात्र नेता था और मैंने इसे बहुत करीब से देखा है। पिछले कुछ सालों में विश्वविद्यालयों में कई राजनैतिक घटनाएँ घटी, जिन्हें देख मुझे महसूस हुआ कि पहले से अब तक बहुत कुछ नहीं बदला हैं। बदले हैं तो सिर्फ पात्र। एक आम आदमी इन घटनाक्रमों को अपने नजरिये से देखता है और इसके पीछे की बड़ी राजनीति को नहीं समझ पाता। मुझे लगा कि ये समय है जब जनता स्टोर जैसी कहानी आनी चाहिए। लोगों को पता लगना चाहिए कि कई बार सामने दिखने वाली घटना उतनी आसान नहीं जितनी आप समझ रहे हैं और कई बार इतनी काम्प्लेक्स भी नहीं जैसी दिखी।

अब क्योंकि आपकी कहानी के किरदार काल्पनिक नहीं हैं तो ऐसे में किरदारों की क्या प्रतिक्रिया है आपकी कहानी को लेकर?

देखिये साहब, लेखकों का बुरा समय कभी भी आ जाता है इसलिए मैं तो यही कहूँगा कि कहानी के पात्रों का वास्तविकता लगना महज एक संयोग है।  लेकिन हाँ, एक मजेदार घटना अवश्य हुई. छात्र राजनीति के समय के कई दोस्तों से कहानी को लेकर चर्चा हुई और ये चर्चा शायद फैली। एक विधायक साहब का कुछ दिन पहले मेसेज आया कि भाई कहानी जो लिखनी है लिखना, पर नाम मिलते-जुलते मत लिख देना. मैंने उस दोस्त को भी यही कहा कि अगर आपकी किसी हरकत से कहानी का कोई हिस्सा मेल खा जाये तो ये सिर्फ संयोग होगा।

सुनने में आ रहा है कि आप अपनी किताब की प्रमोशन के लिए भी कुछ अनोखे तरीके आजमाने जा रहे हैं?

प्रमोशन कई तरीके से हो रहा है और सोशल मीडिया सबसे बड़ा टूल है जो हम इस्तेमाल कर रहे हैं। अगले कुछ दिनों में हम कई इंटरैक्टिव एक्टिविटी सोशल मीडिया पर कर रहे हैं जहाँ पाठक भी अपनी बात कह सकेंगे और कहानी से सीधे जुड़ सकेंगे। हर कहानी की जान उसके किरदार होते हैं, औरमैं अपने किरदारों को भी एक अनोखे रूप में लोगों से परिचित करवाने वाला हूँ।


चलिए अपनी किताब का सार बताने वाला कोई एक गीत जो आपको याद आ रहा हो?

एक पहेली फिल्म का सुमन कल्याणपुर का गाया “मैं एक पहेली हूँ, मुझे जानने वाला कोई नहीं...”

राजस्थान विधानसभा चुनावों से पहले किताब को लाने के पीछे क्या रणनीति है..?

मेरी कहानी सिर्फ छात्र राजनीति की झलक ही नहीं देती बल्कि राजस्थान की राजनीति की भी झलक देती है। कई घटनाक्रम ऐसे हैं जो राजस्थान की राजनीति की गांठें भी खोलती है। किताब लिखते लिखते मैंने महसूस किया कि जो कई घटनाएँ मैं कहानी में लिख रहा था वो सच में घटित हो गई और उनका दूरगामी असर भी होगा। ऐसे में मुझे और मेरे प्रकाशक राजकमल प्रकाशन समूह को लगा कि ये सही समय होगा जब हम इस कहानी को पाठकों को पेश करें।

बहरहाल, कई कंपनियों का ब्रांड देखते-देखते आज खुद ब्रांड बन रहे हैं, कैसा महसूस हो रहा है ?

ये काफी चेलेंजिंग है और कई कारणों से। सबसे पहले मैं प्रोफेशन से मैं मार्केटिंग वाला हूँ इसलिए पाठकों को ये यकीन दिलाना कि जो कहानी बता रहा हूँ वो वाकई उतनी ही मजेदार है, जितनी मार्केटिंग। ये उपन्यास सिर्फ मार्केटिंग नहीं। दूसरा खुद मार्केटिंग वाला होने के नाते पब्लिशर से लेकर सहयोगियों तक सबका मानना है कि ये मार्केटिंग खुद से करेंगे और इन्हें मदद की जरूरत नहीं.इस सबके बावजूद किताब को अच्छे रिव्यु मिलना और प्री-ऑर्डर के पहले 24 घंटे में ही अमेज़न केइंडियन राइटिंग बेस्टसेलर केटेगरी में 34 रैंक पर पहुँच जाना सुखद अनुभव है.लोगों ने मेरे पहले लिखे आर्टिकलोंएवं व्यंग्य के बाद अब उपन्यास लेखन को स्वीकार किया है। ये मेरे लिए उपलब्धि है।

अपनी पृष्ठभूमि के बारे में हमारे पाठकों को बताइये?

मेरा मामला बड़ा ही 2 इन 1 टाइप का है। मैं बिहार में पैदा हुआ पर राजस्थान में पला बढ़ा। मैंने मार्केटिंग में MBA हूँ पर लिखने का शौक लग गया। नौकरी अंग्रेजी की करता हूँ और लिखता हिंदी हूँ। छात्र राजनीति में हाथ आजमा चुका हूँ, इसके अलावा फोटोग्राफी भी ठीक-ठाक कर लेता हूँ और गेट्टी इमेजेज को तस्वीरें देता हूँ। खुद पढने में बहुत मन नहीं लगाया पर कभी-कभी मैनेजमेंट कॉलेज में जाकर गेस्ट लेक्चर दे आता हूँ।

जनता स्टोर को लोगों के बीच खुलने में कितना समय लगा...मतलब कितना समय लगा इसे लिखने में?

कहानी तो तकरीबन 5-6 साल से दिमाग में घूम रही थी पर इसे सही दिशा नहीं दे पा रहा था. कई ड्राफ्ट लिख के एक बार को उपन्यास लिखने का विचार त्यागही दिया था, फिर बीवी के उकसाने पर 2 साल पहले फिर से पूरी कहानी को नए नजरिये से सोचा, आजकल जो विश्वविद्यालयों में घटना घट उनको स्टडी किया फिर तय किया कि मुझे पाठकों को क्या बताना है. उसके बाद पूरी कहानी लिखना सरल हो गया।

देश की राजनीति को लेकर कोई गीत आपके जहन में अगर आता हो?

हम होंगे कामयाब, हम होंगे कामयाब एक दिन, मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास, हम होंगे कामयाब एक दिन।

हमें उम्मीद है किताब भी पूरी तरह कामयाब रहेगी, पर ये बाजार में दिखनी कब शुरू होगी?

धन्यवाद. किताब नवम्बर के आखिरी हफ्ते से बाज़ार में जानी शुरू हो जाएगी. अभी किताब प्री-ऑर्डर पर अच्छे डिस्काउंट के साथ उपलब्ध है. अगर कोई पाठक इसे खरीदना चाहे तो अमेज़न के लिंक https://amzn.to/2Cyud4Sपर जाकर खरीद सकते हैं।

 

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