Thursday, December 1, 2022

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लालकिले पर हमले के दोषी मोहम्मद आरिफ की फांसी की सजा बरकरार , सुप्रीम कोर्ट ने पुनर्विचार याचिका खारिज की

अंग्वाल न्यूज डेस्क
लालकिले पर हमले के दोषी मोहम्मद आरिफ की फांसी की सजा बरकरार , सुप्रीम कोर्ट ने पुनर्विचार याचिका खारिज की

नई दिल्ली । 22 दिसंबर 2000 को लालकिले पर हमले के दोषी मोहम्मद आरिफ उर्फ अशफाक की फांसी को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दायर पुनर्विचार याचिका पर गुरुवार फैसला आ गया है । देश की शीर्ष अदालत ने इस पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दिया है । लश्कर ए तैयबा आतंकवादी और पाकिस्तानी नागरिक आरिफ को 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सज़ा दी थी ।  इस हमले में 3 लोगों की मौत हुई थी, जिनमें एक संतरी और 2 राजपूताना राइफल्स के जवान थे । इस फैसले के बाद मामला एक बार फिर निचली अदालत में जाएगा. वहां से फांसी की तारीख तय होगी और डेथ वारंट जारी होगा । हालांकि, अशफाक के वकील अभी भी क्यूरेटिव याचिका और राष्ट्रपति को दया याचिका भेजने जैसे कदम उठा सकते हैं । 

लालकिले हमले के मामले में मौत की सजा पाए आतंकी मोहम्मद आरिफ की फांसी की सजा को लेकर दायर पुनर्विचार याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी है । चीफ जस्टिस उदय उमेश ललित और जस्टिस बेला एम. त्रिवेदी की एक पीठ ने कहा कि उसने ‘इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड’ पर विचार करने के आवेदन को स्वीकार किया है।  पीठ ने कहा, "हम उस आवेदन को स्वीकार करते हैं कि ‘इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड’ पर विचार किया जाना चाहिए ।  वह दोषी साबित हुआ है ।  हम इस अदालत के फैसले को बरकरार रखते हैं और पुनर्विचार याचिका खारिज करते हैं । "

विदित हो कि 2000 में लाल किला पर हमले के बाद पुलिस ने फोन रिकॉर्ड के आधार पर अशफाक को गिरफ्तार किया था ।  उसने अपना गुनाह कबूल किया था। उसने  माना था कि वह पाकिस्तानी का है और उसका दूसरा साथी अब्दुल शमल एनकाउंटर में मारा गया था । 2005 में निचली अदालत ने भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ने और हत्या के आरोप में उसे फांसी की सज़ा दी थी ।  2007 में हाईकोर्ट ने इस सज़ा की पुष्टि की ।  2011 में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस वी एस सिरपुरकर की अध्यक्षता वाली बेंच ने भी इस सज़ा को बरकरार रखा था। 2013 में आरिफ की रिव्यू पेटिशन और 2014 में क्यूरेटिव याचिका खारिज हुई लेकिन 2014 में ही आए एक फैसले की वजह से उसे दोबारा अपनी बात रखने का मौका मिल गया । 


इस फैसले में संविधान पीठ ने यह तय किया था कि फांसी के मामले में रिव्यू पेटिशन को खुली अदालत में सुना जाना चाहिए ।  इससे पहले फांसी के मामले में भी पुनर्विचार याचिका पर बंद कमरे में जज विचार करते थे। 

विदित हो कि आरिफ उर्फ अशफाक को भी अपनी दलील रखने का मौका देते हुए कोर्ट ने उसकी फांसी पर रोक लगा दी थी । पिछले साल जस्टिस उदय उमेश ललित, एस रविंद्र भाट और बेला एम त्रिवेदी की बेंच ने मामले की सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था।  अब चीफ जस्टिस बन चुके जस्टिस ललित ने आज तीनों जजों की ओर से फैसला पढ़ा ।

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