Wednesday, October 28, 2020

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क्या है एमनेस्टी इंटरनेशनल विवाद , क्यों सरकार ने मानवाधिकार संस्था पर लगाया प्रतिबंध , पढ़ें सरकार -संस्था के दावे 

अंग्वाल न्यूज डेस्क
क्या है एमनेस्टी इंटरनेशनल विवाद , क्यों सरकार ने मानवाधिकार संस्था पर लगाया प्रतिबंध , पढ़ें सरकार -संस्था के दावे 

नई दिल्‍ली। केंद्र की मोदी सरकार ने अवैध फंडिंग को लेकर मानवाधिकार संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल के देश में हो रहे काम पर रोक लगा दी है। सरकार का कहना है कि एमनेस्टी इंटरनेशनल अवैध रूप से फंड मिल रहा है जबकि यह Foreign Contribution (Regulation) Act के तहत रजिस्टर्ड नहीं है। इतना ही नहीं एमनेस्टी इंटरनेशनल पर विदेश से पैसा लेने में वित्तीय अनियमितताओं का आरोप है और ईडी इसकी जांच कर रही है। गृह मंत्रालय के मुताबिक संस्था को एफडीआई के जरिए फंड मिला जिसकी गैर सरकारी संगठनों के मामले में अनुमति नहीं है। वहीं एमनेस्टी इंटरनेशनल ने केंद्र सरकार पर आरोप लगाया है कि वह उसके खिलाफ बदले की भावना से काम कर रही है। उसके बैंक अकाउंट्स को पूरी तरह फ्रीज कर दिया गया है जिससे उसके लोगों को भारत में काम बंद करने के लिए मजबूर होना पड़ा है।

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क्या है सरकार का कहना

असल में इस विवाद पर सरकारी अफसरों का कहना है कि एमनेस्टी इंटरनेशनल को विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (एफसीआरए) के अंतर्गत सिर्फ एक बार और वह भी 20 साल पहले (19.12.2000) स्वीकृति दी गई थी। तब से अभी तक एमनेस्टी इंटरनेशनल के कई बार आवेदन करने के बावजूद पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा एफसीआरए स्वीकृति से इनकार किया जाता रहा है, क्योंकि कानून के तहत वह इस स्वीकृति को हासिल करने के लिए पात्र नहीं है। हालांकि, एफसीआरए नियमों को दरकिनार करते हुए एमनेस्टी यूके भारत में पंजीकृत चार इकाइयों से बड़ी मात्रा में धनराशि ले चुकी है और इसका वर्गीकरण प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के रूप में किया गया। इसके अलावा एमनेस्टी को एफसीआरए के अंतर्गत एमएचए की मंजूरी के बिना बड़ी मात्रा में विदेशी धन प्रेषित किया गया। दुर्भावना से गलत रूट से धन लेकर कानूनी प्रावधानों का उल्लंघन किया गया।

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अवैध कार्यों के चलते आवेदन रद्द किए

सरकार का कहना है कि एमनेस्टी के इन अवैध कार्यों के चलते पिछली सरकार ने भी विदेश से धन प्राप्त करने के लिए उसके द्वारा बार-बार किए गए आवेदनों को खारिज कर दिया था। इस कारण पहले भी एमनेस्टी के भारतीय परिचालन को निलंबित कर दिया गया था। विभिन्न सरकारों के अंतर्गत इस एक समान और पूर्ण रूप से कानूनी दृष्टिकोण अपनाने से यह स्पष्ट होता है कि एमनेस्टी ने अपने परिचालन के लिए धनराशि हासिल करने को पूर्ण रूप से संदिग्ध प्रक्रियाएं अपनाईं।

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अपनी गतिविधियों से ध्यान हटाने की कोशिश


सरकारी अफसरों का इस मुद्दे पर कहना है कि मानवीय कार्य और सत्य की ताकत के बारे में की जा रही बयानबाजी कुछ नहीं, सिर्फ अपनी गतिविधियों से ध्यान भटकाने की चाल है। एमनेस्टी स्पष्ट रूप से भारतीय कानूनों की अवहेलना में लिप्त रहा है। ऐसे बयान पिछले कुछ साल के दौरान की गईं अनियमितताओं और अवैध कार्यों की कई एजेंसियों द्वारा की गई जा रही जांच को प्रभावित करने के प्रयास भी हैं। एमनेस्टी भारत में मानवीय कार्य जारी रखने के लिए स्वतंत्र है, जिस तरह से अन्य संगठन कर रहे हैं। हालांकि, भारत के कानून विदेशी चंदे से वित्तपोषित इकाइयों को घरेलू राजनीतिक बहस में दखल देने की अनुमति नहीं देते हैं। यह कानून सभी पर समान रूप से लागू होता है और इसी तरह एमनेस्टी इंटरनेशनल पर भी लागू होगा।

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क्या है एमनेस्टी का दावा

पिछले कुछ दिनों से यह विवाद चर्चा का केंद्र बना हुआ है । इस मामले में संस्था का कहना है कि उसने दिल्ली में इस साल फरवरी में हुए दंगों पर दिल्ली पुलिस से जवाबदेही की मांग की थी। साथ ही जम्मू-कश्मीर में मानवाधिकार उल्लंघन पर केंद्र से सवाल पूछे थे। यही कारण है कि सरकार उसके खिलाफ बदले की भावना से काम कर रही है और उसकी वित्तीय परिसंपत्तियों को निशाना बनाया जा रहा है। संस्था ने कहा कि बैंक अकाउंट्स फ्रीज करने की जानकारी उसे 10 सितंबर को मिली।

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हमारी आवाज बंद करने की साजिश

इतना ही नहीं एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर अविनाश कुमार का कहना है कि पिछले दो साल से एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के खिलाफ केंद्र सरकार लगातार कार्यवाही कर रही है । हमारे बैंक खातों को पूरी तरह से फ्रीज कर दिया गया है। इसका कारण यही है कि हम केंद्र सरकार और पुलिस के काम को लेकर जवाबदेही की मांग करते रहे हैं । यही कारण है कि सरकारी एजेंसियां हमारा उत्पीड़न कर रही हैं। इनमें ईडी भी शामिल है। हम अन्याय के खिलाफ आवाज उठाते हैं और सरकार की कार्यवाही इस आवाज को दबाने को कोशिश है।

 

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