Monday, October 26, 2020

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जग्गी वासुदेव उर्फ सदगुरू - डॉक्टर के घर पैदा हुआ प्रकृति प्रेमी , जानें कैसे मुड़े सफल व्यापारी से आध्यात्म की ओर

अंग्वाल न्यूज डेस्क
जग्गी वासुदेव उर्फ सदगुरू - डॉक्टर के घर पैदा हुआ प्रकृति प्रेमी , जानें कैसे मुड़े सफल व्यापारी से आध्यात्म की ओर

 नई दिल्ली । योग और आध्यात्म गुरू जग्गी वासुदेव उर्फ सदगुरू के देश विदेश में करोड़ों प्रशंसक हैं । उनकी कलाओं का वर्णन करें तो वह एक अंतरराष्ट्रीय ख्याती प्राप्त वक्ता , एक योगी , लेखक , कवि के रूप से विख्यात हैं । उनकी ईशा फाउंडेशन भारत समेत अमेरिका , इंग्लैंड , लेबनान , ऑस्ट्रेलिया , सिंगापुर में भी योग कार्यक्रम आयोजित करके लोगों को स्वस्थ जीवन का मार्ग दिखाती है । इतना ही नहीं इनकी संस्था सामाजिक कार्यों के साथ ही सामुदायिक विकास योजनाओं के लिए भी काम करती है। इतना ही नहीं उन्हों संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक परिषद में विशेष सलाहकार की पद भी मिला हुआ है। 

5 सितंबर 1957 में डॉक्टर के घर हुआ जन्म

असल में सदगुरू का जन्म 5  सितंबर 1957 को कर्नाटक के मैसूर में एक डॉक्टर के घर हुआ । जब बच्चे अपने खिलौनों से खेलने में ज्यादा समय बिताते थे , सदगुरू ने योग को अपने मन की चंचलता को स्थिर करने का साधन बनाया । तब से आज तक वह नियमित रूप से योग करते आ रहे हैं । उनकी स्कूली शिक्षा मैसूर के Demonstration स्कूल में हुई । इसके बाद उन्होंने मैसूर के विश्वविद्यालस से अंग्रेजी साहित्य में ग्रेजुएशन की । 

दोस्त के साथ चामुंडी हिल जाना था पसंद

अपने कॉलेज के दिनों में सदगुरू आम युवाओं की तरह बाइक चलाना , घूमना पसंद करते थे । उन्होंने अपने दोस्तों के साथ मैसूर के पास चामुंडी हिल जाना बहुत पसंद था । अपनी कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने कई बिजनेस किए । उन्होंने जिनमें पॉल्ट्री फार्म, ईंटे बनाने का काम शामिल था। हालांकि उन्होंने इन व्यापार में काफी सफलता भी मिली और उन्होंने काफी धन भी कमाया । 

जानिए सदगुरू के जीवन के कुछ पहलू...

- असल में सदगुरू को बचपन  से ही प्रकृति से बहुत प्रेम था , यही कारण था कि वह कुछ दिनों के लिए जंगल में चले जाते थे और वहीं कंदमूल खाकर अपना जीवन व्यतीत करते थे। इस दौरान ऊंचे ऊंचे पेड़ों पर बैठककर प्रकृति का आनंद लेना उन्हें बहुत भाता था । 

- 11 साल की उम्र में जग्गी वासुदेव ने योग करना शुरू किया । उन्हें योग की शिक्षा दी उनके गुरु राघवेंद्र राव ने । 

- अपनी युवा अवस्था में जहां उन्होंने बिजनेस शुरू किया , वहीं उन्हें क्रिकेट और गोल्फ खेलना भी बहुत पसंद था । 

-- वर्ष 1984 में उन्होंने पेशे से बैंकर विजयकुमारी से शादी की, 1990 में वह पिता बने, उन्होंने अपनी बेटी का नाम राधे रखा । लेकिन उनकी पत्नी की मृत्यु 1997 में हुई। 

-जग्गी वासुदेव जब 25 साल के थे तो उनके जीवन में कुछ ऐसा हुआ कि उन्होंने अपने जीवन से सभी सुखों का त्याग किया और जंगल पहाड़ों की ओर हो लिए । 


- उन्होंने चामुंडी पर्वत पर चढ़ाई की और एक विशाल पत्थर पर जाकर आसन जमा लिया । इसके बाद उन्होंने आध्यात्म की ओर अपना मन कर लिया । इस दौरान उन्होंने आध्यात्म में परम आनंद मिला । खुद सदगुरू के अनुसार , उस दिन उन्हें ऐसा महसूस हुआ कि उनका शरीर अब चट्टानों , पेड़ - पौधों - प्रकृति और पृथ्वी में फैल गया है । इसके बाद उन्हें इस तरह का अनुभव कई बार हुआ । 

- लगातार अपने साथ हुए इस अनुभव को दूसरों के साथ बांटने के लिए उन्होंने अपना पूरा जीवन ही दूसरे में इसका एहसास करवाने में लगा दिया । 

- कुछ समय जंगल में आध्यात्म में लगाने के बाद उन्होंने अपने इस अनुभव को योग के माध्यम से लोगों में बांटने का मन बनाया और अपने एक कभी न खत्म होने वाले मिशन में जुट गए ।

- उनके कार्यक्रमों में 15,000 से अधिक प्रतिभागी हुआ करते थे , योग कक्षाओं से जमा हुए पैसे को वे दान करते। 

- 1983 में अपनी पहली योग कक्षा शुरू करने के 10 साल बाद 1993 में उन्होंने ईशा योग केंद्र स्थापित किया य़

- यह  केंद्र संयुक्त राष्ट्र की अंतरराष्ट्रीय निकायों आर्थिक और सामाजिक परिषद के साथ काम करता है । 

- उन्होंने अपनी  बेटी की शादी कर्नाटक के शास्त्रीय गायक संदीप नारायण से की । 

- सद्गुरु ने साल 2006, 07, 08 और 09 में विश्व आर्थिक मंच में भाग लिया ।

-  2000 में संयुक्त राष्ट्र मिलेनियम वर्ल्ड पीस शिखर सम्मेलन को भी संबोधित किया । 

- वह 8 भाषाओं में 100 से ज्यादा पुस्तकों की रचना कर चुके हैं । वह अच्छे वास्तुकार भी हैं । 

-अपने लक्ष्य के लिए उनके द्वारा किए गए कार्यों के मद्देनजर उन्हें 2017 में पद्म विभूषण से नवाज़ा गया । 

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