Saturday, July 11, 2020

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दिल्ली की जेएनयू ...आखिर कितनी है ज़ेन्यून ?

अंग्वाल न्यूज डेस्क
दिल्ली की जेएनयू ...आखिर कितनी है ज़ेन्यून ?

-धैर्यकांत मिश्र, स्वतंत्र टिप्पणीकार

दिल्ली में 1019.37 एकड़ में फैला हुआ दिल्ली स्थित जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय फिर से चर्चा में है। हालांकि पिछले 5 सालों में शायद ही ऐसा कोई महीना गया होगा, जब यह विश्वविद्यालय चर्चाओं में नहीं आया हो । पिछले पाँच सालों में JNU की छवि, जनमानस में बहुत बदली है । एक जमाने में इंटेलेक्टचुअल और शोधकर्ताओं के गढ़ के लिए मशहूर JNU अब ग़लत कारणों के लिए ज्यादा सुर्खियों में आ रही है। हालांकि जहां इसमें कुछ तथ्य सही भी हैं तो काफी अफ़वाह भी।

फ़ीस वृद्धि को लेकर जिस तरह से JNU के छात्र प्रोटेस्ट कर रहे है, वो अद्भुत है।  हालांकि इसके पीछे बहुत से सवाल हैं , जिसपर बात नहीं हो रही है । एक धड़ा ये भी सोच रहा है कि  ये प्रोटेस्ट कहीं ना कहीं उन बहस को दबाने की साज़िश भी हो सकती है, जो पिछले 5 सालो में JNU के बारे में सामने आई हैं। हाल में दूसरों को सहिष्णुता और संविधान का पाठ पढ़ाने वाले JNU के छात्रों का दोयम रवैया भी सामने आया लेकिन उसपर वाजिब बहस नहीं हो पाई। या यू कहें जब बहस शुरू हुई तो वो किसी प्रदर्शन की बलि चढ़ गई ।

JNU पिछले पाँच सालो में

JNU में सबकुछ ठीक था लेकिन कन्हैया और उमर ख़ालिद प्रकरण के सामने आने के बाद बहुत सी चीज़ें बदलनी शुरू हो गईं। ये बात सच है कि उस प्रकरण ने कन्हैया को बहुत लोकप्रियता दी । ये बात भी सच है कि उसी प्रकरण ने पहली बार JNU को प्राइम टाइम के स्लॉट में लाकर कुछ हफ़्तों तक खड़ा कर दिया और जिसके बाद से JNU  की छवि बहुत हद तक डेंटेड हो गई, या कहे कर दी गई। मीडिया ने अपने हिसाब से चीज़ों को दिखाया और कभी भी एक सार्थक बहस नहीं की। इसके परिणामस्वरूप उसके बाद के कॉरेस्पॉंडिंग इन्सिडेंट और प्रोटेस्ट को लोग प्रोटेस्ट के नज़रिए देखने में दिक्कत होने लगी।

क्या अपनी विचारधारा से अलग नहीं सुन सकते JNU वाले

विश्वविद्यालय का एक बहुत बड़ा धड़ा सिर्फ़ इस बात के लिए रामदेव का कार्यक्रम रद्द करवाने की माँग करता है क्यूँकि वो किसी विचारधारा का अनुसरण करते हैं। क्या सहिष्णु का ब्रेक डाँस करने वाले JNU के छात्रों के पास इतना धैर्य नहीं है कि वो अपनी विचारधारा के विपरीत कुछ सुन सकें? सुब्रह्मणियम स्वामी से लेकर विवेकानंद की मूर्ति तोड़ने तक, इस विश्वविद्यालय ने अपनी छवि खुद ही इतनी धूमिल कर ली है कि इसके आंदोलन को गम्भीरता से लेना मुश्किल हो रहा है जितना पहले लिया जाता था। हाल के प्रोटेस्ट में आंदोलनकारी छात्रों का रवैया जैसा मीडिया के साथ रहा वो भी काफ़ी दुखद है । ये और दुखद हो जाता है जब आप इसकी माफ़ी नहीं माँगते और इसको ग्लोरिफ़ाई करते है सोशल मीडिया पर।

अकडेमिक्स के मामले में अभी भी JNU का कोई सानी नहीं है और ये बात हर साल आ रही विश्वविद्यालयों के रैंकिंग से साबित हो रही है । भारत सरकार की NIRF रैंकिंग में ये विश्वविद्यालय दूसरे नम्बर पर है और NAAC ने JNU को A++ ग्रेड श्रेणी में रखा है । आज इसी NAAC ने पटना विश्वविद्यालय की रैंकिंग घटा कर C कर दी है जिसपर कोई हो हल्ला नहीं हो रहा है क्यूँकि जिस विश्वविद्यालय की रैंकिंग ही C है वहाँ के छात्रों का मनोबल और मनोविज्ञान जानने के लिए आपको इसरो जाने की ज़रूरत नहीं है। बिहार के छात्र कुछ दिन पहले गमछे के लिए एक आंदोलन खड़ा कर बैठे थे।

JNU में फ़ीस वृद्धि और सख़्त नियमवाली

19 साल से JNU में फ़ीस नहीं बढी है , फ़ीस बढ़ने की प्रक्रिया को सतत बनाना होगा , नहीं तो ऐसे हंगाम होते रहेंगे। दिल्ली मेट्रो का किराया भी ऐसे ही बढ़ाया गया था जिसपर खूब हो हल्ला हुआ , लेकिन बाद में सब ठीक हो गया । JNU में पढ़ने वाले और दिल्ली मेट्रो में रोज़ सफ़र करने वाले अलग अलग लोग हैं , इसलिए JNU का प्रोटेस्ट इतनी आसानी से ख़त्म नहीं होगा । सरकार ये बात समझती है और इसलिए शुरू से ही आक्रामक है। लेकिन सबको सबकुछ दिख रहा है , लाठी ऐसे नहीं भाजी जाती है छात्रों पर, बिना सरकार के आदेश के इस तरह से जानवरो की तरह पीटना वो भी छात्रों को, सम्भव नहीं है। 


क्या मुद्दा सिर्फ फीस वृद्धि का है..

मुद्दा सिर्फ़ JNU में हो रही फ़ीस वृद्धि का नहीं है, देश के अलग अलग राज्यों में भी फ़ीस वृद्धि का विरोध हो रहा , कोलकाता से लेकर देहरादून, हर जगह प्रदर्शन हो रहे है लेकिन जेएनयू को लेकर होते रहे विवादों के चलते यहां की छोटी सी हरकत भी बड़े रूप में नजर आती है । इस मामले में सरकार ने आंशिक रूप से कुछ बदलाव किए लेकिन JNU वालों ने इसको ऐक्सेप्ट नहीं किया, उनको पुरानी फ़ीस स्ट्रक्चर ही चाहिए जो कि एक ग़ैर वाजिफ सवाल है। 19 साल से आप एक ही फ़ीस देकर सभी सुविधावो का लाभ नहीं उठा सकते हैं। सरकार के पास भी लिमिटेड संसाधन है और उसको और भी विश्वविद्यालय भी देखने है, JNU एक मात्र विश्वविद्यालय नहीं है देश में।

लेकिन सवाल ये भी है कि क्या ये विरोध फ़ीस बढ़ोतरी के लिए ही हो रही है या इसके पीछे कोई और बाद भी है? JNU में हॉस्टल को लेकर बहुत सी खबरें आती रहती हैं, कॉलेज प्रशासन ने कुछ समय पहले हॉस्टल के नियम सख़्त कर दिए है जिससे छात्र नाराज़ है, उनका मानना है कि वो कब आए और कब जाए ये उनका अधिकार होना चाइए । लेकिन जब वो ये बोलते है तो वो भूल जाते है वो एक विश्वविद्यालय के हॉस्टल में रहते है जिसका एक पर्सेंट किराया भी अपनी जेब से नहीं दे रहे है और विश्वविद्यालय के होस्टल के कुछ नियम क़ायदे है, उसका पालन करना अनुशासन होता है, अधिकारों का हनन नहीं।

छात्रों से नहीं लिया जाता खर्च का 20 फीसदी भी

2012-13 में JNU द्वारा जारी की गयी एक फ़ैक्ट शीट के अनुसार JNU में एक बच्चे की पढ़ाई पर औसतन साल में 233,194 खर्च करती है, इसके बदले सरकार 20 फीसदी भी नहीं है लेती है JNU छात्रों से । फिर भी मेरा ये मानना है कि सरकार को छात्रों से बात करनी चाहिए और वहाँ पढ़ रहे छात्रों का आर्थिक पक्ष की भी जांच करनी चाहिए । जो BPL या EWS हो उनको आर्थिक सहायता देकर , बढ़ी हुई फ़ीस को लागू कर देना चाहिए ।

शिक्षा सस्ती होनी चाहिए , सबको मिलनी चाहिए, जिसके पास संसाधन नहीं है उसको संसाधन उपलब्ध करवाकर शिक्षा देनी चाहिए, लेकिन जिसके पास संसाधन हैं उसको 300 रुपये का हॉस्टल चार्ज और 10,000 रुपये का मेस चार्ज देने में कोई दिक्कत नहीं है क्यूँकि हाथों में आइफ़ोन लेकर 300 रुपये के लिए रोते JNU के कई छात्र दोगले नजर आते हैं।

देश में शिक्षा की व्यवस्था

देश की शिक्षा व्यवस्था का पता बस इस बात से लगाया जा सकता है कि वर्ल्ड टैलेंट रैंकिंग में हम नीचे से पाँचवे नम्बर पर है, 63 देशों में भारत का स्थान 59वाँ है, हमसे आगे चाइना, दक्षिण अफ़्रीका और रुस जैसे देश है । पूरे भारत में सिर्फ़ दिल्ली ही ऐसा राज्य है जिसमें शिक्षा और उसके स्तर को लेकर बहस हो रही है और चुनाव में इसको मुद्दा बनाया जा रहा है, बाँकि किसी भी राज्य में ऐसी स्थिति पैदा नहीं हुई है जो कि शर्मनाक है लेकिन लोगों का, उनके लिए अभी पहली प्राथमिकता राम मंदिर है, फिर सिवल कोड और तीसरा तीन तलाक़।

बहरहाल , लोकतंत्र में हर किसी को अपनी बात कहने का हक है , लेकिन अपने हक के लिए हुंकार भरने वालों को इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि देश संविधान के तहत चलता है और इसके तहत आने वाले कानून और नियम कायदों को आप ताक पर रखकर, अपनी बात डंडे के जोर पर कहने के लिए सड़कों पर नहीं आ सकते ।

वहीं कहीं न कहीं देश की सरकार को भी चाहिए कि इस तरह के मुद्दों को देश की मुख्य धारा की राजनीति पार्टियों की साजिश का शिकार बनने से रोका जाए। ऐसा न होने की सूरत में ऐसे हंगामे आगे भी नजर आते रहेंगे ।  

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