Friday, January 19, 2018

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उत्तराखंड की राजनीति में खट्टे-मीठे अनुभव लेकर आया साल 2016, पहली बार हुआ ऐसा ...

अंग्वाल संवाददाता
उत्तराखंड की राजनीति में खट्टे-मीठे अनुभव लेकर आया साल 2016, पहली बार हुआ ऐसा ...

देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति से जुड़े कई खट्टे-मीठे अनुभवों के साथ साल 2016 का अंत होने जा रहा है। सियासी चश्मे से देवभूमि में राजनीति की बिसात को देखें, तो यह साल सर्वाधिक उठापटक वाला रहा। राज्य की सत्ता पर काबिज कांग्रेस सरकार के मुखिया हरीश रावत के खिलाफ अपनी ही पार्टी के विधायकों ने बगावत के सुर बुलंद कर दिए। अस्थिरता के लंबे दौर में प्रदेश ने 16 साल में पहली बार सरकार की बर्खास्तगी और राष्ट्रपति शासन देखा।

कैसे सुलगी बगावत की चिंगारी ? 

राज्य की राजानीति में अस्थिरता की शुरुआत विजय बहुगुणा की राज्यसभा दावेदारी से शुरू हुई। पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा के समर्थकों को मंत्रिमंडल में जगह न मिलना और राज्यसभा सीट पर भी उनकी दावेदारी नकारे जाने से बगावत की नींव पड़ गई थी। कांग्रेसी खेमे में अंदर ही अंदर सुलग रही चिंगारी 18 मार्च को भड़क गई। विधानसभा में बजट प्रस्ताव रखे जाने के दौरान सत्ताधारी दल के नौ विधायकों ने अपनी ही सरकार के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंक दिया।

नई सरकार के गठन का आग्रह

बागी कांग्रेसी विधायक और भाजपा के सदस्यों ने राज्यपाल कृष्णकांत पाल से मुलाकात की और रावत सरकार के अल्पमत में होने का हवाला देते हुए उसे हटाकर नई सरकार के गठन का आग्रह किया। तत्कालीन परिस्थितियों के मददेनजर राज्यपाल ने मुख्यमंत्री रावत को बुलाया और उनसे सदन में अपना बहुमत सिद्व करने को कहा। 

सीएम, सीडी और स्टिंग

26 मार्च को एक और नाटकीय मोड़ आया जब एक निजी टीवी चैनल ने मुख्यमंत्री रावत को कथित रूप से अपनी सरकार बचाने के एवज में बागी विधायकों की खरीद-फरोख्त करते दिखाया। स्टिंग ऑपरेशन की यह सीडी बागी विधायकों और बहुगुणा के बेटे साकेत ने दिल्ली में एक संवाददाता सम्मेलन के दौरान जारी की। उत्तराखंड में मचे राजनीतिक तूफान पर करीब से नजर रख रही केंद्र सरकार इस स्टिंग सीडी के जारी होने के बाद हरकत में आ गई। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने तत्काल इस सीडी की सत्यता को परखने के लिए उसे चंडीगढ़ स्थित फॉरेंसिक लैब भेजा और वहां से उसके सही होने की रिपोर्ट मिलते ही कैबिनेट ने प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू करने की मंजूरी लेते हुए उस पर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की भी सहमति ले ली।


फिर बनी रावत सरकार

ग्यारह मई को राष्ट्रपति शासन के हटने की अधिसूचना जारी होते ही करीब ढाई महीने बाद रावत सरकार प्रदेश में दोबारा सत्तासीन हो गई। बागी विधायकों की सदस्यता का मुद्दा भी उच्चतम न्यायालय तक पहुंचा लेकिन उस पर कोई फैसला आने से पहले ही सभी विधायक भाजपा में शामिल हो गए। नौ बागी विधायकों के अलावा सोमेश्वर से कांग्रेस की विधायक रहीं रेखा आर्य भी भाजपा में सम्मिलित हो गईं और कांग्रेस छोड़ने वाले विधायकों की कुल संख्या 10 तक पहुंच गईं।

‘शक्तिमान’ घोड़े पर छिड़ा विवाद

मार्च के शुरू में प्रदेश सरकार के खिलाफ भाजपा के प्रदर्शन के दौरान शक्तिमान की टांग टूट गई और इसका आरोप मसूरी से भाजपा विधायक गणेश जोशी पर लगा। लाठी का प्रयोग कर शक्तिमान की टांग तोड़ने के आरोप में पुलिस ने जोशी तथा दो अन्य पार्टी कार्यकर्ताओं के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया। उधर, घायल शक्तिमान की टांग का ऑपरेशन किया गया और विदेशी डॉक्टरों तक को बुलाया गया, लेकिन उसे बचाया नहीं जा सका। 

हरदा पर घोटालों के आरोप

मुख्यमंत्री रावत पर शराब माफिया, खनन माफिया और भूमाफिया को बढ़ावा देने, केदारनाथ में हेलीकॉप्टर कंपनी घोटाला और आबकारी घोटाला जैसे आरोप लगे। मुख्य विपक्षी भाजपा ने इन आरोपों पर मुख्यमंत्री को सीधे निशाने पर लेते हुए कहा कि वह आगामी विधानसभा चुनावों में इन मुद्दों को लेकर जनता के पास जाएगी। 

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