Wednesday, September 20, 2017

जानिए मां ब्रह्मचारिणी के अलौकिक स्वरूप और उनकी पूजा के विधि-विधान को

पंडित विवेक खंकरियाल
जानिए मां ब्रह्मचारिणी के अलौकिक स्वरूप और उनकी पूजा के विधि-विधान को

सर्व मंगल मांगल्ये सिवे सर्वाथ साधिके ।

शरण्ये त्रयंबके गौरी नारायणी नम्स्तुते । ।

 

माता की भक्ति का भक्त सरोबोर हो गए हैं। कहीं मां के जगराते हो रहे हैं तो कहीं चौकी। नवरात्रों के दूसरे दिन मां ब्रहमचारिणी का पूजन-अराधना की जाती है। तो चलिए आपको बताते हैं मां ब्रह्मचारिणी के स्वरूप की पौराणित कथा।

 

मां ब्रह्मचारिणी हिमालय और मैना की पुत्री थीं। जिन्होंने नारद जी के कथनानुसार, भगवान शंकर की कठिन तपस्या की, जिससे खुश होकर ब्राह्मा जी ने उन्हें मनवांछित वरदान दिया। इसके प्रभाव से मां ब्रह्मचारिणी ने भोले शंकर को वर रूप में प्राप्त किया। संस्कृत भाषा में ब्रह्म का अर्थ तपस्या होता है। यानि की तप का अनुसरण करने वाली मां भगवती को ब्रह्मचारिणी रूप से जाना जाता है। इनका स्वरूप पूर्णजोर्तिमय एवं अत्यंत भव्य है। मां के दाहिने हाथ में जप की माला एवं बाएं हाथ में कमंडल है। शास्त्रों के अनुसार, मां की पूजा करने से कुंडलीनी शक्ति जागृत होती हैं,जिससे इंसान को सफलता प्राप्त होती है।

 

--पूजन का विधान--

1- मां का पूजन करने से पहले अपने देवस्थान को साफ कर लें। इसके बाद गंगाजल का छिड़काव कर स्थान को पवित्र करें और अपने हिसाब से सजा लें।

 

2- इसके बाद सर्वप्रथम गणेश पंचांग चौकी तैयार करें, जिसमें गौरी-गणेश, ओमकार (ब्रहमा-विष्णु-महेश) स्वास्तिक, सप्त घृतमात्रिका, योगनी, षोडस मात्रिका, वास्तु पुरुष, नवग्रह देवताओं समेत वरुण देवता को तैयार करें।


 

3- तदोपरांत सर्वतो भद्र मंडल (चावल से बनाया गया आसन, जिसपर आह्वान करके हमारे सभी देवी-देवताओं को विराजमान किया जाता है। ) को तैयार करें।

 

4- इसके बाद एक सकोरे में मिट्टी भरकर उसमें जौ को बोएं और देव स्थान पर रख दें।

 

5- इसके बाद माता के मंदिर को चुनरी और फूल मालाओं से सजाएं। माता की मूर्ति पर रोली का टिका लगाएं। चावल लगाएं। साथ ही देवस्थान पर अपनी श्रद्धानुसार फल-फूल-मिष्ठान तांबुल दक्षिणा इत्यादि समर्पित करें।

 

6- इसके बाद अपने अनुसार या ब्राह्मणों के द्वारा पाठ करें/कराएं।

 

कल पढ़ें मां के तीसरे स्वरूप के बारे में.....

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