चिड़ियों की चहचहाहट, कोयल की कूक और कौवे की कांव-कांव में तो हम सबको अंतर समझ आता है। लेकिन आपको शायद ही पता हो कि कोस-कोस पर पानी बदले और चार कोस पर बानी वाली कहावत पक्षियों पर भी लागू होती है। जी हां, दुनियाभर में ऐसे कई पक्षी हैं जिनकी चहचहाहट किसी क्षेत्र की भौगोलिक स्थिति के साथ बदल जाती है। पक्षियों की बोली-भाषा समझने के कोशिश में लगे विशेषज्ञ तो कम से कम इसी निष्कर्ष पर पहुंचे हैं। अब पक्षी विज्ञानी यह पता लगाने में जुटे हैं कि कोरोना काल ने पक्षियों की बोली पर क्या असर डाला है।
पक्षियों की बोली-भाषा समझने में तो वैज्ञानिक दशकों से लगे हैं। इसे कागज-कलम या दूसरी भाषा में कहें तो इलेक्ट्रोकॉर्डियोग्राम के जरिये दिखाने का श्रेय ब्रिटेन में जन्मे पक्षी व्यवहारशास्त्री डॉ. पीटर मार्लर को जाता है। पचास के दशक में कैंबिज यूनिवर्सिटी से अपना कैरियर शुरू करने वाले डॉ. मार्लर ने द्वितीय विश्व युद्ध के समय हुई दो बड़ी तकनीकी खोज पोर्टेबल टेप रिकॉर्डर और सोनिक स्पेक्ट्रोग्राफ की मदद से अपनी खोज को आगे बढ़ाया। इसके साथ ही यह पता लगा कि पक्षी अलग-अलग समय पर अलग-अलग तरह की आवाजें निकालते हैं। इससे वैज्ञानिक इस नतीजे पर पक्षी भी इंसानों की तरह ही आपस में बात करते हैं। इसके पहले तक यही माना जाता था कि यह पक्षियों का जेनेटिक गुण हैं।
बहरहाल, बात कोरोना काल की करें तो हाल में आई खबरें बताती हैं कि लॉकडाउन में तमाम तरह की औद्योगिक गतिविधियां बंद होने से पर्यावरण और प्रदूषण की स्थिति में सुधार हुआ है। इससे कई क्षेत्रों में सकारात्मक नतीजे भी नजर आए हैं। कहीं नदियों का पानी साफ हो गया है तो कहीं लगभग गुम हो गए पशु-पक्षी भी नजर आने लगे हैं। ऐसे में पक्षी विज्ञानियों का ध्यान इस ओर गया है कि आखिर इसका पक्षियों की बोली पर क्या असर पड़ा है।
रिसर्च में पाया गया है कि किसी एक ही पक्षी के चहचहाने या गाने की आवाज में दो अलग-अलग जगहों पर कुछ न कुछ अंतर पाया जाता है। अमेरिकी पक्षी विज्ञानी एलिजाबेथ डेरीबेरी के मुताबिक, कई पक्षियों की बोली में स्थानीय वातावरण का भी खासा असर पड़ता है। ऐसे में उन्हें लगता है कि निश्चित तौर पर कोरोना के बदले वातावरण में पक्षियों की बोली पर भी असर जरूर पड़ेगा। पिछले कुछ सालों में खासकर शहरी इलाकों में यह बात देखने में आई है कि ट्रैफिक और कंस्ट्रक्शन के कारण होने वाले शोर में शायद अपनी गुम होती आवाज को बजाए रखने के लिए चिड़ियों ने काफी ऊंचे सुर में गाना शुरू कर दिया है। अब देखना होगा कि क्या कोरोना काल में कम होते ध्वनि प्रदूषण क्या पक्षियों का सुर बदलेगा।