Sunday, June 24, 2018

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किस ओर जा रहा प्रदेश का 'भविष्य' ?

किस ओर जा रहा प्रदेश का

9 नवंबर साल 2000 को जब उत्तर प्रदेश से अलग होकर उत्तराखंड एक अलग राज्य बना था... तो उसके पीछे सबसे बड़ा मकसद उत्तराखंड का विकास और बेहतर राज्य बनाना था... आज राज्य को अस्तित्व में आए 15 साल हो गए हैं... लेकिन क्या प्रदेश के विकास का जो सपना आंदोलनकारियों ने देखा था वो अब तक पूरा हो पाया है ? इसका अधिकतर जवाब नहीं में होगा... शायद यही वजह है कि प्रदेशवासी उत्तराखंड से पलायन कर दूसरे राज्यों की तरफ रूख कर रहे हैं... पलायन की एक सबसे बड़ी वजह बेरोजगारी भी है.. उत्तराखंड के सेवायोजन के रिकॉर्ड पर अगर नजर डालें तो प्रदेश के 9,16,752 युवाओं को रोजगार की तलाश है... हालांकि उत्तराखंड राज्य बनने के बाद युवाओं को रोजगार मुहैया कराने के लिए समूह ग, प्रवक्ता, एलटी शिक्षक, प्राइमरी शिक्षक समेत विभिन्न वर्गों में खाली पदों पर भर्तियां की... लेकिन वो ऊंट के मुंह में जीरा से ज्यादा और कुछ नहीं है... सेवायोजन विभाग के ताजा आकंड़ों के मुताबिक इन 9 लाख 16 हजार 752 लोगों में सबसे ज्यादा इंटरपास बेरोजगार युवकों की संख्या है... प्रदेश में करीब 3 लाख 77 हजार 752 इंटर पास बेरोजगार युवक है... इसके अलावा हाईस्कूल से कम शैक्षिक योग्यता वाले 35 हजार 110, हाईस्कूल पास एक लाख 67 हजार 016, स्नातक 2 लाख 23 हजार 236 और ग्रेजुएट 1 लाख 13 हजार 688 बेरोजगार है... आकंड़े ये बताने के लिए काफी है कि प्रदेश में रोजगार की क्या स्थिति है... आखिर प्रदेश का युवा किस कदर बेरोजगारी से जूझ रहा है ?


 एक सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि प्रदेश में बेरोजगार युवाओं में से सबसे ज्यादा बेरोजगार प्रदेश की अस्थाई राजधानी देहरादून जिले में पंजीकृत है... जबकि सबसे कम 23,010 पंजीकृत बेरोजगार चंपावत में है... वहीं अगर बाकी जिलों पर नजर डाली जाए तो अल्मोड़ा में 69हजार 700, नैनीताल में 99 हजार4, पिथौरागढ़ में 69 हजार355, उधमसिंह नगर में एक लाख 241, बागेश्वर में 30 हजार 802, टिहरी में 69 हजार 58, उत्तरकाशी में 39 हजार 784, हरिद्वार में एक लाख एक हजार 720, पौड़ी में 63 हजार 852, चमोली में 42 हजार 890, रूद्रप्रयाग में 27 हजार 75 बेरोजगार पंजीकृत है... जाहिर है कि ये आंकड़े काफी चिंताजनक है... और प्रदेश के विकासपथ पर एक सबसे बड़ा रोड़ा है... बात करें प्रदेश सरकार की तो वो भी प्रदेश की स्थिति से भलीभांति वाकिफ है... सरकार और विभाग की तरफ से कई बार प्राइवेट कंपनियों में रोजगार मुहैया कराने के लिए सेवायोजन कार्यालयों की ओर से रोजगार मेले आयोजित किए जाते रहे हैं... बावजूद इसके बेरोजगारों की संख्या में कमी नहीं आ रही है... विभागीय अधिकारी इसके लिए कहीं न कहीं उन युवाओं को भी जिम्मेदार मानते हैं, जिन्हें रोजगार तो मिल जाता है... पर वो इस बारे में विभाग को सूचित नहीं करते हैं, जिससे बेरोजगारी के आंकड़ों में कमी नहीं आ पाती है... हो सकता है विभागीय अधिकारियों की बात सही हो... लेकिन ये भी सच है कि प्रदेश में रोजगार एक सबसे बड़ी समस्या बनी हुई है... रोजगार की तलाश में प्रदेश के युवा दूसरे राज्यों की तरफ रूख कर रहे हैं... उत्तराखंड से पलायन कर रहे हैं... ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि आखिर किस ओर जा रहा है प्रदेश का 'भविष्य' ? क्या ऐसे होगा प्रदेश का विकास ? ऐसे कई सवाल है कि प्रदेशवासियों के मन में कई दिनों से दौड़ रहे होंगे... ? ऐसे में बेरोजगारी सरकार के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है... उससे बड़ी चुनौती सरकार के सामने युवाओं के लिए रोजगार के अवसर पैदा करना है ? पर जिस विकास के सपने के लिए उत्तराखंड अस्तित्व में आया था... अगर उसे पूरा करना है... तो प्रदेश और केंद्र सरकार को उत्तराखंड और उत्तराखंडवासियों के बारे में सोचना होगा... तभी प्रदेश का 'भविष्य' सुनहरा होगा... 

  

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