Tuesday, October 20, 2020

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क्या ''खुशी'' पाने के लिए सुशांत सिंह राजपूत ने चुना खुदकुशी का रास्ता ?

अंग्वाल न्यूज डेस्क
क्या

शाश्वती डी मिश्रा

मैं उनसे कभी नहीं मिली... ना ही मैं उनको जानती थी, फिर भी मेरे साथ उनका एक रिश्ता है क्योंकि जो सपने उनके आंखों में थे वही सपने मेरे आंखों में भी थे जब मैं सपनों के शहर मुंबई आई थी.

सुशांत सिंह राजपूत....  टेलीविजन के दुनिया के होते हुए भी मैंने उन्हें सिर्फ टीवी या फिल्म के पर्दे पर ही देखा, मिलने का मौका कभी नहीं मिला. लेकिन उनकी आत्महत्या की खबर ने मुझ जैसे कई सपने देखने वालों को बेचैन कर दिया. खासतौर पर उन लोगों को जो कला की दुनिया में अपनी पहचान बनाने के लिए इस शहर में आए हैं, सोचते होंगे क्या यह दुनिया इतनी ही कठोर और मायूसी भरी है ? क्या हालत ऐसे बुरे हो जाते हैं कि सपना देख कर सुख की नींद सोने वाले को गोली खाकर भी नींद नहीं आती और आखिरकार अपने हालत से छुटकारा पाने के लिए अपनी जान देनी पड़ती है?

हां... नाउम्मीदी तो है यहां... लॉबी बाजी, चापलूसी, सब कुछ है लेकिन यह भी समझना पड़ेगा कि देश के हर कोने से लोग यहीं आते हैं शोहरत और पैसा कमाने . तो कुछ भी पाना यहां आसान तो नहीं होगा... यह भी सोचना पड़ेगा कि यह एक इंडस्ट्री है बिजनेस है और बिजनेस में सिर्फ फायदा देखा जाता है और इसलिए यहां सिर्फ हुनर की कीमत नहीं लगाई जाती . यह है लेन-देन की दुनिया ...हुनर के साथ तोला जाता है बेचने वाले का सोशल स्टैंडिंग, ब्रांड, उससे जुड़े दूसरे फायदे क्योंकि आपके ब्रांड का टैग ही अक्सर तय करता है आपका हुनर कितना बिकेगा ना कि सिर्फ आप के हुनर की क्वालिटी. इसलिए यहां अपने हुनर को विकसित करने के साथ-साथ अपने ब्रांड को बनाना पड़ता है . इस वजह से कई बार वाकई जो नया कुछ करना चाहता है और सिर्फ अपने हुनर को बेचने चल पड़ता है उनके साथ नाइंसाफी हो जाती है . कला के व्यापारी कला का ही गला घोट देते हैं .

सुना है एक के बाद एक सुशांत के प्रोजेक्ट के डील्स भी कैंसिल हो रही थीं, प्रोफेशनल राइवल्री, पॉलिटिक्स... हो सकता है ...यहां होता है ऐसा कई लोगों के साथ हो चुका है आखरी वक्त पर प्रोजेक्ट से निकाल दिए जाते हैं... मेहनत करे कोई और नाम कोई और ले जाता है... काबिल इंसान को नहीं अपने आदमी को मौका दिया जाता है... कला और साबुन में फर्क नहीं किया जाता है.... यहां टैलेंट की, कोई कमी नहीं है, कमी है तो मौके की...  मौके, जिन पर सिर्फ कुछ गिने-चुने लोगों ने कब्जा कर के रखा है... लेकिन यह तो इंसान का जमीर है जो तय करता है. वह आपके साथ न्याय करेगा या अन्याय... आप मोर्चा भी निकाल ले, लेकिन इंसान के जमीर को कैसे सुधारोगे  ? इसीलिए यहां लड़ना पड़ता है, शायद इसी का नाम ‘स्ट्रगल’ है.

कई साल पहले एक गीतकार ने खूब कहा था, जरा हटके जरा बचके यह है मुंबई मेरी जान... लेकिन यही वह जगह भी है जहां अचानक एक मसीहा मिलता है जो आपको सिर्फ हुनर के वजह से ही बुलंदी तक पहुंचा देता है. बस अगर आपके भाग्य ने आप का साथ दिया तो, इसलिए बस थोड़े सब्र की जरूरत है . यह मैदान, ठीक जैसे के चेस बोर्ड . धैर्य और एक सटीक परिकल्पना से लक्ष्य की तरफ बढ़ने की तैयारी होनी चाहिए लेकिन क्या सुशांत हो गए थे बेसब्र? इसलिए हुई यह दुर्घटना ?...

पर उनकी कहानी अब तक तो एक सफलता का प्रतीक था. बहुत ही कम समय में सब कुछ तो पा लिया था उन्होंने... छोटे पर्दे से बड़े पर्दे तक का सफर, जो सफर यहां हर कोई तय करना चाहता है पर आसानी से कर नहीं पाता है... तो फिर क्यों किया सुशांत  ने ऐसा ? क्या बार-बार प्यार के संबंध का टूटना भी एक वजह था ? या मुंबई के हार्डकोर प्रोफेशनल दुनिया में सच्चे दोस्त के कमी से पैदा हुए अकेलेपन ने उनकी जान ले ली?

 जब कई ऐसे सवाल मेरे मन में लगातार उठ रहे थे तब मेरे सामने आया एक वीडियो जिसमें था 2016 में दिए गए सुशांत का एक स्पीच... और उनके मन में उठे विचारों का तूफान मुझे साफ दिखने लगा

उस स्पीच में उन्होंने बताया, जब वह एक विद्यार्थी थे, इंजीनियरिंग के एंट्रेंस क्लियर करना ही उनकी जिंदगी का एक मात्र लक्ष्य था... उन्होंने जी तोड़ मेहनत की और एंट्रेंस को अच्छे रैंकिंग के साथ क्लियर किया, दिल्ली आईआईटी में दाखिला मिल गया. उनके लिए यह एक बहुत बड़ा अचीवमेंट था . वह बहुत खुश थे सक्सेस से बस कुछ ही कदम दूरी पर अपने आप को देख रहे थे लेकिन थर्ड ईयर तक पहुंचते पहुंचते इंजीनियरिंग की पढ़ाई से उनकी दिलचस्पी जाने लगी... उन्हें अब वह पढ़ाई इतना मजेदार नहीं लग रही थी ... उस माहौल में अब खुशी नहीं मिल रही थी वह कहीं और खुशी ढूंढने लगे... शायद जिंदगी के इस मोड़ पर उनका एक नया सफर शुरू हुआ....खुशी की खोज....

 उस दौरान, उन्होंने डांस क्लास ज्वाइन की थी और अब उन्हें डांस में दिलचस्पी और मजा आने लगा , उन्हें खुशी डांस और कला के क्षेत्र में दिखाई देने लगी...  एक माया मृग के तरह वह क्षेत्र उन्हें खींचने लगा... नतीजा यह हुआ थर्ड ईयर में इंजीनियरिंग का कोर्स छोड़कर वह मुंबई आ गए कला की दुनिया में एक अभिनेता बनने..

अब उन्हें जिंदगी में एक नया लक्ष्य मिल गया था... 2 साल बहुत स्ट्रगल किया कठिनाई उठाई लेकिन वह खुश थे क्योंकि उनके सामने एक लक्ष्य था... भाग्य ने उनका जबरदस्त साथ दिया और 2 साल के अंदर उन्हें टीवी के परदे में बतौर एक हीरो बड़ा ब्रेक मिल गया और एक बड़े ब्रांड का भी टैग मिल गया...

 उस वीडियो में उन्होंने बताया कि पर्दे में अपने आपको देखने से जो किक मिलती है वह और किसी चीज से नहीं मिलती. उनके सितारे आसमान छूने लगे जल्दी उन्हें फिल्म में भी ब्रेक मिल गया. टीवी के परदे से फिल्म तक का सफर कई लोग नहीं कर पाते लेकिन उन्होंने किया और बहुत ही कम समय में कर दिखाया. यह एक बड़ा अचीवमेंट था उनके लिए... वह खुश थे ...वह अपने लक्ष्य तक पहुंच गए थे... लगातार उन्होंने एम एस धोनी जैसे कई बेहतरीन फिल्मों में काम किया.... लेकिन कोई भी कहानी जैसे क्लाइमैक्स तक पहुंचने के बाद एंड की तरफ बढ़ती हैं वैसे ही अब शायद सुशांत को एंटरटेनमेंट के दुनिया में भी ‘’किक’’ नहीं मिल रही थी... उन्हें नए चैलेंज की तलाश थी.... उन्हें लक्ष्य चाहिए था जिसे वह हासिल कर सके. धीरे-धीरे शायद वह फिर से मायूसी में डूबने लगे थे ...खुशी के लिए उनकी खोज फिर से शुरू हो गई थी... वह शायद फिर से जिंदगी के मायने ढूंढने लगे थे... जाहिर है अब किसी और चीज की तरफ उनका मन भागने लगा...  जैसे कि एस्ट्रो-फिजिक्स.. लेकिन अब शायद कोई लक्ष्य सामने नजर नहीं आ रहा था... वह एस्ट्रोनॉट या साइंटिस्ट तो नहीं बन सकते थे अब !!

अपनी उस स्पीच में सुशांत कहते हैं कि उन्होंने जिंदगी के इस मोड़ पर यह समझा की खुशी चाहिए तो उन्हें वर्तमान में जीना पड़ेगा ना अतीत ना भविष्य सिर्फ वर्तमान में ही एक्साइटमेंट ढूंढना पड़ेगा जो अब वह करने की कोशिश कर रहे हैं... उन्हें जिंदगी के इस गहरे सच का ज्ञान हुआ.... लेकिन क्या सच में वह यह कर पा रहे थे??

सुशांत का कम उम्र से ही बार-बार खुशी की तलाश करना जल्दी किसी चीज से दिलचस्पी खो देना और हर पल एक्साइटमेंट ढूंढना.... जिंदगी के मायने खोजने का एक सफ़र था.. वह एक दार्शनिक थे, लेकिन इन बातों को एक साइकैटरिस्ट के नजर से देखा जाए तो यह शायद डिप्रेशन का लक्षण है.


 ‘डिप्रेशन’.... सीधी भाषा में कहा जाए तो इस मानसिक अवस्था में एक इंसान को किसी भी भौतिक चीज मैं खुशी नहीं मिलती, मिलती भी है तो बस थोड़ी देर के लिए ..वह खुशी की तलाश करता रहता है.... अपने जीवन  मैं हमेशा कुछ कमी महसूस करने लगता है ..जिंदगी जीने के लिए कोई भी चीज उसे उत्साहित नहीं कर पाती है... और एक दिन अचानक जिंदगी जीने की वजह खो देना...जब जिंदगी में दुख और किसी  अपने की मृत्यु का सामना होता है तब ऐसे मनोस्थिति पैदा होती है.... इंसान जिंदगी का अर्थ ढूंढने लगता है.. अपने अस्तित्व को खंगालने लगता है.. क्या सुशांत भी अपने कॉलेज के दिनों से ही ऐसी मानसिक अवस्था में थे? क्या उनकी मां की मृत्यु उनके मन में एक गहरी छाप छोड़ गई थी?

बचपन से ही कुछ बड़ा बनने का दबाव, जवानी में दोस्तों से प्यार नहीं सिर्फ कंपटीशन का मिलना फिर कर्मक्षेत्र में टिके रहने का दबाव, आसमान से भी आगे निकलने की महत्वाकांक्षा तनाव बढ़ता गया और मन अशांत होता गया.....क्या यही है जिंदगी का मतलब? आज के समय में ऐसी मनो स्थिति कई युवाओं में देखा जाता है...

 शायद तभी, सुशांत खोजने लगा, ऐसी परिस्थिति जहां कोई गम ना हो... हमेशा खुशी और एक्साइटमेंट हो... लेकिन यह मुमकिन नहीं था.... और यह समझ में आया तो उन्होंने अपनी जिंदगी खत्म कर दी??

लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि राजकुमार सिद्धार्थ, गौतम बुद्ध बने थे इसी खुशी की तलाश में. राजपाट उन्हें खुशी नहीं दे पा रहा था. सिद्धार्थ ने सवाल किया हम हमेशा खुश क्यों नहीं रह सकते ? किसी ज्ञानी ने उन्हें कहा था कि हर आदमी के घर जाओ और पूछो क्या उनके घर में कभी दुख ने दस्तक नहीं दिया ? और जब उन्हें हर एक इंसान के जिंदगी में दुख के अस्तित्व का ज्ञान हुआ तब वह मायूसी में डूब गए ...उन्हें किसी भी ऐसो आराम या भौतिक सुख से खुशी का अनुभव होना बंद हो गया... क्योंकि वो जान गए कि यह ख़ुशी हमेशा के लिए नहीं है.. और तभी उन्होंने जिंदगी के सही अर्थ खोजने का सफर शुरू किया.. उन्हें परम ज्ञान मिला कि दुख जिंदगी का परम सत्य है और वह गौतम बुद्ध बने ..हमेशा खुश रहने का मंत्र उन्हें अध्यात्मावाद में मिला..... इस संदर्भ में मेरा मन यह सवाल करता है कि अगर वह आज का जमाना होता तो क्या लोग उन्हें डिप्रेशन का पेशेंट कहते?

हमारे समाज में कुछ ऐसे संवेदनशील आत्माएं हैं जो जीवन के मायने ढूंढने निकल पड़ती हैं ...आज की तारीख में हम उन्हें बीमार बताने लगते हैं लेकिन यही वह जिज्ञासा है जो बड़े-बड़े ऋषि मुनियों को घर संसार छोड़ने पर मजबूर करते थे और आज भी करते हैं तो क्या हर मुनि ऋषि डिप्रेशन का शिकार है?

यह एक अंतरीन खोज है... इस राह के राही को दवाई नहीं अपने लोगों का साथ और आध्यात्मिकता की जरूरत है. भारत और पश्चिमी सभ्यता में बस एक ही फर्क है भारत में अध्यात्मवाद है और पश्चिमी सभ्यता में दवाई..... भारतीय संस्कृति में यही अंतरीन खोज एक आम इंसान को बोधी बनाते थे... ऐसे खोज करने वाले लोग सामान्य नहीं होते हैं असामान्य होते हैं... उन्हें सही दिशा मिले तो वह बुध और रामकृष्ण परमहंस जैसे ज्ञानी पुरुष बनते हैं ना मिले तो दवाई उनकी बुद्धि को धुंधला कर देती है और मन के सवाल फाँस बनकर उनका गला घोट देते हैं.... जैसे कि सुशांत के साथ हुआ ....और कई लोगों के साथ हुआ है, और होता रहेगा.

क्योंकि अध्यात्मवाद को हम अहमियत नहीं देते... अध्यात्मवाद को अपनाने का मतलब यह नहीं कि आप साधु संत बन जाए..... हम लोग अध्यात्मवाद को धर्म से जोड़ देते हैं इसलिए नकारते हैं... लेकिन अध्यात्मवाद एक जीवन शैली है जो हमें मानसिक संतुलन बनाए रखने का, खुश रहने का असल मंत्र बताता है....

सुशांत अपनी खोज में रास्ता भटक गया ...क्योंकि ना उन्हें अध्यात्मवाद का सहारा था ना दोस्त का.. आज एक दोस्त दूसरे दोस्त को डॉक्टर का एड्रेस फॉरवर्ड करके यह पूछना भूल जाता है कि वह डॉक्टर के पास गया था या नहीं, दवाई समय पर लेता है या नहीं, यूं ही जब कोई दोस्त दो बातें करना चाहे तो आपने आप को बिजी  बताकर टाल देना आम बात हो गई है.. बस जिन से संबंध रखने से हमारा निजी फायदा है उसी से संबंध रखते हैं हम... तो जब आमतौर पर इंसानियत इतनी गिर गई है, फायदा और नुकसान के मापदंड पर हर रिश्ते को तोला जाता है तो मीडिया वाले अपना फायदा देखते हैं तो क्या गलत करते हैं?

सुशांत संवेदनशील आत्मा था वह साधारण नहीं था . आज के डेट में जो कोई भी डिप्रेशन का शिकार होता है वह इंसान आम नहीं होता है... वह लोग अपने काम में ब्रिलियंट होते हैं आम लोगों से बहुत ज्यादा संवेदनशील होते हैं....वह लोग एक अलग दुनिया में जीते हैं... उनके पास एक सोचने वाला दिमाग होता है... बाकि लोग भौतिक चीजों से दिल बहला लेते हैं गहराई में जीवन के बारे में कभी सोचते ही नहीं...

ऐसे लोग गहराई से सोचने की क्षमता रखते हैं इसलिए ज्यादातर कलाकार, साहित्यकार, कवि इस स्थिति में पाए जाते हैं... वह जिंदगी के मायने ढूंढते हैं... जिंदगी को बे- मायने नहीं अर्थ पूर्ण बनाना चाहते हैं... सुशांत भी शायद इसी सफर पर था.. इसीलिए शायद  समाज सेवा भी की. किताबो में डूबे रहने लगे .. लेकिन.. लॉकडाउन में घर में कैद रहते हुए जिंदगी के सवाल उन्हें और भी ज्यादा परेशान करने लगे थे ... जिंदगी के मायने खोजते खोजते... जीवन एक पीड़ा है और मृत्यु, शांति यह महसूस हुई और उन्होंने शांति को चुन लिया और परम खुशी की दुनिया में चले गए. जहां खुशी का कोई अंत नहीं... यही गौतम बुद्ध का बताया परम ज्ञान है.... पीड़ा, दुःख जीवन का निष्कर्ष है लेकिन सुशांत यह नहीं जान पाए थे कि बुध ने यह भी कहा था कि अगर जिंदगी एक पीड़ा है यह मान लो तो मरना नहीं जीवन को जीना सीख जाओगे, जीने में मजा आएगा खुशी भी लौट आएगी और मृत्यु तक का सफर एक सुहाना सफर बन जाएगा... अगर जान जाते सुशांत... तोह आप आज भी हामारे साथ होते !! 

(यह लेखिका के व्यक्तिगत विचार हैं,वह मुंबई की टीवी इंडस्ट्री में पिछले 15सालों से कार्यरत हैं)

 

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